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अदालत ने पीआईएल का दायरा किया छोटा

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल और अन्य शैक्षणिक संस्थाआें में प्रवेश, मकान मालिक-किरायेदार के मामले, नौकरी, पेंशन, ग्रेच्युटी तथा कुछ अपवादों के अलावा केन्द्र और राज्य सरकारों के खिलाफ दायर मुकदमों पर जनहित याचिका के रूप में विचार न करने का फैसला किया है। पत्नी, बच्चों व माता-पिता के गुजारा-भत्ते से सम्बंधी मामलों में न्याय के लिए याचिकाकर्ता को अब दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत याचिका देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का मकसद मौलिक अधिकारों के हनन के नाम पर अनावश्यक रूप से याचिका दायर करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है। इन निर्देशों के तहत अब किसी व्यक्ित विशेष अथवा निजी हित से जुड़े मामले को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा और कुछ खास किस्म के मामले ही इसके दायरे में आएंगे। इनमें बंधुआ मजदूरी, उपेक्षित बच्चा, श्रम कानूनों का उल्लंघन, श्रमिकों के शोषण, कैदियों की शिकायतें, पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करने, पुलिस हिरासत में मौत, महिलाआें का उत्पीड़न, विवाहिता को जलाने, बलात्कार, हत्या-अपहरण जैसे मामले, पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, पारिस्थितिकी अंसतुलन, प्राचीन धरोहरों, संस्कृति, वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण, खाद्य पदाथर्ो में मिलावट, दंगा पीड़ितों और कुटुम्ब पेंशन जैसे मामले शामिल किए गए हैं। कैदियों की सजा पूरी होने से पहले अथवा पेरोल पर रिहाई जैसे मामले अब अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दायर नहीं किये जा सकेंगे क्योंकि इन मामलों को सम्बधित हाईकोर्ट अधिक कारगर तरीके से निबटा सकता है।

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