DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जमीनी आंदोलनों की देन है महिलाआें की बेहतर तस्वीर

पाकिस्तान और बांग्लादेश में मजहब, सैन्य शासन और पितृसत्तात्मक समाज से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की आधारभूमि बनाने में ही काफी समय लग गया। लेकिन जमीन से उठे आंदोलनों ने स्थितियों को काफी हद तक बदला। लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में ‘नारीवाद,शिक्षा व ज्ञान के बदलाव : संस्थाएँ व प्रक्रियाएँ’ विषय पर आयोजित सेमिनार के तीसरे दिन यह बात पाकिस्तान से आई निखत सईद खान व बांग्लादेश से आई सुरैया बेगम ने अपने शोधपत्र में उजागर की।ड्ढr पाकिस्तान में वीमेंस एक्शन फोरम की संस्थापिकाआें में से एक सुश्री खान ने बताया कि पाकिस्तान के संविधान में शुरूआत से ही महिलाआें को दोहरा मताधिकार हासिल था लेकिन जनरल अयूब खान के समय में इसे निलंबित कर दिया गया।ड्ढr जनरल जिया के समय में अधिकतर विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थाएँ जमाते इस्लामी के नियंत्रण में थीं। 1में पहली बार महिलाएँ सड़क पर आईं और लोकतंत्र के लिए लड़ाई में योगदान किया। 1में बेनजीर को महिलाआें ने ही बेनजीर को भारी मतों से जिताया। हाल के दिनों में फिर से महिला अधिकारों को लेकर संघर्ष का नया दौर शुरू हुआ है।ड्ढr ढाका विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सुरैया बेगम ने बताया कि बांग्लादेश में महिला प्रधानमंत्री तो बन सकती है लेकिन स्वीपर परिवार की औरतें ‘चौधरी’ नहीं बन सकतीं। इस समाज की औरतें घर की कमाई में 35 फीसदी से अधिक योगदान करती हैं, परिवार की जिम्मेदारी भी निभाती हैं लेकिन उन्हें दोयम दर्जा हासिल है। सँपेरे समुदाय की औरतों को 10 मील दूरी तक काम के लिए जाना पड़ता है और अक्सर दुराचार व उत्पीड़न का शिकार भी बनती हैं। श्रीलंका की अनुजा विक्रमसिंघे ने जोर दिया कि अतीत की उपलब्धियों के बजाए भविष्य की चुनौतियों पर ध्यान दिया जाए। उमा चक्रवर्ती ने मणिपुर, कश्मीर, गुजरात में महिलाआें के साथ हुई ज्यादतियों के संदर्भ में विभिन्न महिला अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाएँ जो लिखती हैंड्ढr उसे ज्ञान के रूप में स्वीकार नहींड्ढr किया जाता।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: जमीनी आंदोलनों की देन है महिलाआें की बेहतर तस्वीर