DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

काहे का एतराज

चीन के बारे में कुछ भी कहना हमेशा से मुश्किल रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले जब कांग्रेस की नेता चीन दौरे पर गई थीं तो लग रहा था कि सब कुछ नहीं, तो कुछ तो बदल ही रहा है। और फिर जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीन दौरे पर गए तो लगा था कि चीन अब पहले जैसा कड़ियल देश नहीं रहा। यह भी कहा गया कि वह चीन अब गंभीर किस्म की आर्थिक ताकत बन गया है, जो अब सीमा के विवादों से ज्यादा महत्व आर्थिक रिश्तों को देने लगा है। इस मौके पर कुछ ही दिन पहले की कई बातों को भुला दिया गया। इस बात को कि हू जिंताआें की भारत यात्रा से पहले चीनी अधिकारियों ने अरुणाचल प्रदेश और तवांग पर चीन के दावे की बात को जोरशोर से उठाया था। और यह भी कि कुछ ही दिन पहले भारत के अधिकारियों के दल की चीन यात्रा सिर्फ इसलिए टाल देनी पड़ी थी कि अधिकारियों में एक अरुणाचल का था और चीन ने उस पर आपत्ति की थी। ऐसा ही भ्रम अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के समय भी हुआ था। तब यह कहा गया था कि चीन ने विवादास्पद मसलों का जिक्र नहीं किया है, क्योंकि अब वह भारत के साथ व्यापार चाहता है, विवाद नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हाल ही में अरुणाचल दौरे पर चीन ने जिस तरह विरोध जताया है, वह यही बताता है कि चीन की प्राथमिकताएं भले ही बदल गई हों, लेकिन उसके सुर और राग नहीं बदले हैं। प्रधानमंत्री ने अपने दौरे में वहां दस हजार करोड़ रुपए की परियोजनाएं शुरू कीं और यह कहा कि अरुणाचल ही भारत का वह हिस्सा है, जहां से सूरज की पहली किरण भारत को छूती है। चीन को इस पूरे दौरे पर ऐतराज है। उसका तर्क यह है कि अरुणाचल उसका भूभाग है और भारतीय प्रधानमंत्री को वहां नहीं जाना चाहिए था।ड्ढr चीन का यह ऐतराज उठाना एक साथ कई बातें बताता है। एक तो यह कि सिर्फ यही सोच कर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता है कि सिर्फ आर्थिक रिश्तों के सुधार से ही हमारी सीमाआें के ऐतिहासिक विवादों का हल निकलेगा। दूसरा यह कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए जो भी बात चल रही है, उसमें कोई प्रगति नहीं हो पाई है। या अगर वह है भी तो भी उसकी दिशा चीन को रास नहीं आ रही। किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने 17 साल बाद अरुणाचल की यात्रा की है। इसलिए एक सहज सवाल यह भी कि जिसे हम भारत का अभिन्न अंग मानते हैं, उससे इस तरह का ठण्डा बर्ताव क्यों? दरअसल हर प्रधानमंत्री को सीमावर्ती प्रदेशों में जरूर जाना चाहिए, ताकि एक तो उन प्रदेशों की जनता को लगे कि वह भी भारत की मुख्यधारा का हिस्सा है। और दूसरे इसलिए भी कि दुनिया को संदेश जा सके कि भारत अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को लेकर गंभीर है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: काहे का एतराज