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वैरागी वसंत

भगवान कृष्ण ने गीता में स्वयं को ‘ऋतुनाम कुसुमाकर:’ कहकर वसंत ऋतु की श्रेष्ठता उजागर की है। यह ऋतु चैत्र एवं बैसाख महीनों में होती है। अपनी मधुरता के कारण इन महीनों को मधु-माधव भी कहते हैं। प्रकृति इस समय पुराने पत्तों का त्याग कर नई कोंपलों को धारण करती है। इसलिए वसंत का आगमन पुराने ऋण और बोझ उतार फेंकने का भी सूचक है। इस समय घर में कैद होकर रह गई दिनचर्या में बदलाव आने लगता है। इस मौसम के आते ही लोग घरों से बाहर निकलकर जीवन के नए रंग संजोने लगते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति माधुर्य से गदरा उठती है। उसके सौन्दर्य की मादकता उस माधुर्य भार को संभाल नहीं पा रही है। कहीं कली किलकारी मार रही है। चहुं आेर वसंत ही वसंत है-ड्ढr ‘द्वार में दिसान में, दुनी में देस देसन मेंड्ढr देखो दीप द्वीपन में, दीपत दिगंत हैड्ढr बीथिन में, बृज में, ननेलिन में बेलिन मेंड्ढr बनन में, बागन में, बगर्यो वसंत है।’ड्ढr सम्पूर्ण प्रकृति मनुष्य के लिए वरदान है। इसकी प्रत्येक वस्तु उपयोगी है, इसलिए सूखी पत्तियों एवं टहनियों को एकत्र कर होलिका दहन की तैयारी वसंत पंचमी के दिन से आरम्भ हो जाती है। सामूहिक नृत्य गान और आपसी चुहलबाजियों के बीच इस दिन मोहल्ले-मोहल्ले होलिका स्थापित की जाती है।ड्ढr वसंत नई रचना का, नई सृष्टि के प्रारम्भ का प्रतीक है और मनुष्य की रागात्मक आकुलता की पहचान है। भले ही वेलेन्टाइन डे के रूप में एक नया प्रेम पर्व हमारे बीच अपनी पैंठ बना रहा हो, परन्तु हमारी संस्कृति का शाश्वत दर्शन जो काम पर्व के रूप में आदि काल से हमारे समाज में मान्य है, उसमें भी शक्ित तथा फक्कड़ बैरागी भाव जुड़ा है। इस फक्कड़ बैरागी भाव की परिणति काम को भस्म करने वाले शिव के विवाह दिवस शिवरात्रि के रूप में होती है, जो इस ऋतु का एक प्रमुख पर्व है। ये हमारी भारतीयता है जो ‘राग’ में भी ‘विराग’ को खोज लेती है।ड्ढr वसंत पंचमी वागेश्वरी जयंती और मां सरस्वती का जन्म दिवस है। इस दिन भक्ित भाव से विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का पूजन अर्चन किया जाता है, जो कि द्योतक है इस बात की कि अनुराग और उल्लास के इस पर्व में बुद्धि विवेका का संबल बना रहे। प्रकृति के यौवन स्वरूप इस मधुमास में हमारा तन-मन भी एक सुहानी मधुर मादकता से भर उठता है। अभावों और कुंठाआें से भरे जीवन का हर मधुमास तो उमंग और उल्लास से आेत-प्रोतड्ढr नहीं होता। कभी-कभी जिन्दगी की कशमकश इस वासंती रंग को फीका करने लगती है, तोड्ढr क्यों न इसी वसंत को उसकी सम्पूर्णता में जी लिया जाए।

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