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उमा भारती का चिंतन

‘गुजरात में मोदी राज में हिन्दुआें का बहुत नुकसान हुआ।’ उमा भारती का बयान पढ़कर आश्चर्य हुआ और हंसी भी आई। पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव में उमा भारती ने ही भाजपा का धुआंधार प्रचार किया था, मोदी का गुणगान भी। तब यह कैसे इस बात को भूल गई थीं। शायद भाजपा से हाशिए पर धकेले जाने, मजबूरन पार्टी छोड़े जाने के बाद, इनकी याददाश्त वापस आई।ड्ढr नीलम, मैत्रेयी कॉलेज, नई दिल्ली मौसम का मिा, वसंत में शीतड्ढr टेसू चटख रहे थे कि शीतलहर ने देश को अपनी बांहों में जकड़ लिया। मौजूद फसल और प्रकृति के सौंदर्य पर पाला पड़ गया। बसंत पंचमी सम्मुख है और शीत का आलम बड़े दिनों वाली छुट्टियों का है। मौसम का यह विचित्र बदलाव यह सोचने पर विवश हो गया कि यह कैसे हुआ? बीस वषरे के अंतराल के बाद मौसम का यह विचित्र व्यवहार देखा गया। वर्षा के आसार ने तैयार फसलों पर कहर बरपाने की तैयारी कर ली है। किसान की दीर्घकाल से उपेक्षा है। इस मौसम भर की कौन चिंता करे? मौसम विज्ञानी किसानों के संदर्भ में खास सेवाएं नहीं दे रहे, न क्षति पर सरकार उतनी संवेदनशील है।ड्ढr जी. के. स्नेही, नानाखेड़ा, उज्जन चिट्ठी से परिवार की याद ..ड्ढr फिल्म ‘नाम’ का गाना ‘चिट्ठी आई है..’ सुनकर किसकी आंखें नम नहीं होंगी। अब चिट्ठी कोई लिखता नहीं और यदि कोई चिट्ठी लिखे भी तो मोबाइल से उसे सांत्वना मिल जाएगी कि चिट्ठी मिल गई है। इस गाने में और भी बातें जैसे औलाद का परदेश में बसना। फिर उन्हें दुख सुनाकर वापस बुलाना। विभिन्न त्योहार हैं, जो पारिवारिक सदस्यों के न होने के कारण फीके लगते हैं। बुरा ही लगता है, जब खुशी के मौके पर अपने ही न हों। इधर मां बाप तन्हा जिन्दगी गुजार रहे हैं, उधर औलाद परदेश में। दुख की घड़ी भी हो तो औलाद को आने में वक्त लग जाता है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहें या एक शहर में रहें कितना अच्छा हो।ड्ढr दिलीप कुमार गुप्ता, बरेली जिसका डर था, वही हुआड्ढr इस बार भी ‘भारत रत्न’ राष्ट्रीय सम्मान असमंजस की स्थिति के चलते किसी को भी नहीं दे पाए। राजनीति के चलते इस बार भी कोई निर्णय नहीं हो सका, यह क्रम पिछले सात वषरे से चल रहा है, वह सम्मान किसी को नहीं मिल पाया। इस बार गणतंत्र दिवस से पूर्व ही भारत रत्न देने की विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मांग करने के कारण केन्द्र सरकार और निर्णायक कमेटी किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाई। वही हुआ जिसका डर था, यानी न ही तो खाआे और न ही खाने दो की कहावत चरितार्थ कर दी। यारों इस सम्मान को इतना भी सस्ता मत बनाआे कि इसकी सार्थकता ही खो दे। वैसे महानता किसी ‘रत्न’ की मोहताज नहीं होती, ऐसे महापुरुषों को जनता सर आंखों पर बिठा लेती है। जैसे सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, गांधी और लालबहादुर शास्त्री जैसी कई महान हस्तियों के लिए अब से पूर्व भारत रत्न की मांग नहीं की और उनको जरूरत भी नहीं थी तभी वे आज भी करोड़ों लोगों में जिंदा हैं। यह पुण्यकार्य जनता को ही करने दें। इससे बड़ा कोई सम्मान नहीं होता है।ड्ढr सुरेन्द्र प्रभावत खुर्दिया, सेक्टर-11, रोहिणी, दिल्ली विवाद खड़ा करने की संस्कृतिड्ढr बात-बात पर विवाद खड़ा करने की जो संस्कृति भारत देश में विकसित हो रही है इससे सर्वाधिक अहित राष्ट्र का हो रहा है, आजकल की राजनीतिक चर्चाआें की सरगर्मी में भारत रत्न जैसे सवर्ोच्च गरिमामय पुरस्कार का आ जाना यह साबित करता है कि वह दिन दूर नहीं, जब लोग भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त व्यक्ित को भी किसी उपलब्धि के लिए कम, जुगाड़ में सफल होकर भारत रत्न को हथियाने वाला ही सर्वाधिक मान बैठेंगे।ड्ढr कृष्ण कुमार उपाध्याय, बैरिहवां, बस्ती, उ.प्र.ं

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