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मुशर्रफ का नन्हा सियासी कैदी

हुकूमत-ए-पाकिस्तान का वह सबसे कमउम्र सियासी कैदी है। उसकी उम्र महज आठ साल है। बेशक यह बंदीगृह उसका अपना घर ही क्यों न हो, पर इतनी कच्ची उम्र में जो दुश्वारियां वह झेल रहा है, उसे देखकर नहीं लगता कि उस जैसे मासूम के लिए खूंखार कैदियों की कोई बदनाम जेल भी इससे अलहदा हो सकती है। वह शारीरिक रूप से विकलांग है और उसे हर महीने मेडिकल चेक अप की जरूरत है, पर जेल में तब्दील यह घर उसका यह हक भी छीन चुका है। जी हां, यह मासूम कैदी है, देश के पूर्व चीफ जस्टिस और मुशर्रफ के धुर विरोधी इफ्तखार मोहम्मद चौधरी का बेटा बिलाज चौधरी, जो राजधानी इस्लामाबाद में राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के आलीशान सरकारी आवास से कुछ सौ मीटर की दूरी पर मौजूद एक घर में अपने मां-बाप और बहनों के साथ नजरबंद है। वह शारीरिक रूप से विकलांग है और अपना वक्त टीवी पर काटरून देखते हुए बिताता है। तीन माह से चौधरी अपनी बेगम और चार बच्चों के साथ अपने घर में नजरबंद हैं। घर तक पहुंचने वाला रास्ता कंटीले तारों से ढका हुआ है और परिसर के बाहर हथियारबंद पुलिस व खुफिया एजेंसियों के दस्ते तैनात हैं। सख्ती इतनी है कि कोई परिंदा तक पर नहीं फड़फड़ा सकता। घर के सारे फोन काट दिए गए हैं, वाटर सप्लाई भी दुरुस्त नहीं है। जो एकमात्र कर्मचारी खाना ले जाता है, उसकी भी पहले जामा-तलाशी ली जाती है। यहां तक कि घर के सदस्यों की फ्रंट लॉन में चहलकदमी भी मना है। हालांकि जस्टिस चौधरी के बारे में कोई खबर बाहर नहीं आने दी जाती। लेकिन इस एहतियात के बावजूद इस हफ्ते उनकी16 वर्षीय बेटी पलवाशा ने चोरी-छिपे मोबाइल फोन पर गार्जियन अखबार को एक दुर्लभ इंटरव्यू में बताया- ‘मैं ऊपरी मंजिल की सीढ़ियों पर बैठी हूं और खिड़की के बाहर खुफिया एजेंसी के लोगों और हथियाबंद पुलिस को देख सकती हूं। उनकी संख्या 50 के करीब है। उनके रहते हम यहां से बिल्कुल भी नहीं हिल सकते।’ पांच बेडरूम वाले इस ‘जेल’ के अंदर जिंदगी बहुत दुश्वार है। मुख्य दरवाजे पर पैडलॉक लगा है और कोई भी अंदर-बाहर आ-जा नहीं सकता। यहां तक कि मासूम बिलाज को भी बाहर जाने की इजाजत नहीं है जो कि जन्म से ही विकलांग है। उसका हर महीने मेडिकल चैकअप जरूरी है लेकिन सख्त पहरे के बीच वह भी संभव नहीं है। पलवाशा के पास वक्त काटने के लिए हैरी पॉर्टर की किताबें हैं जिन्हें वह कई-कई बार पढ़ चुकी है। उसे इस बात की चिंता है कि उसकी आगे की पढ़ाई कहीं छूट न जाए। वह अपना स्कूल और सहपाठियों को बहुत मिस करती है। अलबत्ता, उसने बताया कि उसकी बड़ी बहन 18 वर्षीय इफरा का प्राइवेट एग्जाम लेने के लिए ब्रिटिश काउंसिल के अधिकारियों को इजाजत जरूर दी गई। चाहे जो हो, चौधरी की किशोरवय बेटी पलवाशा के इस आत्मविश्वास में कहीं न कहीं सुखद भविष्य के संकेत छिपे हो सकते हैं- ‘मुझे यकीन है, अंतत: जीतेंगे हम ही।’

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