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दम तोड़ रही है बाल श्रमिकों को मुख्य धारा से जोड़ने की योजना

नौ से चौदह वर्ष के बाल श्रमिकों को लिखना पढ़ना सिखाकर उनको समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की योजना शुरुआती दिनों में ही दम तोड़ रही है। चार माह में बाल श्रमिकों के दो फीसदी भी खाते बैंक या डाकखाने में नहीं खोले जा सके हैं। स्कूल चलाने के लिए संगठनों को अग्रिम भुगतान नहीं मिलने के कारण शुरू के महीनों में स्कूल संचालन के नाम पर खानापूर्ति ही की गयी है।ड्ढr ड्ढr 12 स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से जिले में कुल एक सौ बाल श्रमिक विशेष विद्यालय खोलने का दावा जिला प्रशासन द्वारा किया गया है। इनमें से राजधानी में पांच संगठनों के माध्यम से 27 और देहाती क्षेत्रों में सात संगठनों के द्वारा 73 स्कूल चलाने की बात कही जा रही है। हिन्दुस्तान की टीम ने राजधानी में चलने वाले बाल श्रमिक स्कूलों की पड़ताल की। इस दौरान बाल श्रमिकों को मुख्य धारा से जोड़ने की योजना सच्चाई कम दिखावा अधिक दिखी। वैसे दिखावा भी चंद स्कूलों में ही था। राजधानी में चल रहे पीरमुहानी, आईएमए हॉल के पीछे और लोहानीपुर के स्कूलों को छोड़ दिया जाये तो अब तक कहीं भी व्यावसायिक शिक्षा देने की शुरुआत नहीं की गयी है। छोटे सी जगह में भेड़-बकरियों की तरह बच्चे बैठते हैं। एक-दो संगठनों को छोड़ दिया जाये तो बाकी संगठनों द्वारा पोषाहार के नाम पर घटिया चावल व दाल की खिचड़ी दी जाती है। जब राजधानी के स्कूलों की यह स्थिति है तो देहाती क्षेत्रों में चलने वाले स्कूलों का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।ड्ढr ड्ढr संचालकों ने बताया कि इस योजना को व्यावहारिक रूप से कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बैंक या डाकघर खाता खोलने को तैयार नहीं है। कुछ संगठनों ने बिचौलिए के माध्यम से बच्चों का रेकरिंग खाता खुलवाना शुरू किया है।

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