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प्रेम, पर्व और नौकरशाही की दीवार

प्रवासी भारतीय दिवस की वार्षिक रस्म पर भारत सरकार ने प्रवासी भारतीयों को जागरूक बनाने का जो बीड़ा उठाया है, उसकी कड़ी छानबीन करने की जरूरत है। भारत की सरकारें- राज्य और केन्द्र दोनों ही स्तरों पर- प्रवासी भारतीयों को जागरूक बनाने का भरसक प्रयास करती रही हैं। इस तरह के प्रयासों के जीवंत उदाहरण हैं: विशेष रूप से गठित प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय द्वारा दुनियाभर में फैले अपने देश के प्रवासी भारतीयों के लिए की गई नीतिगत पहल। जैसे, आेवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया, प्रवासी भारतीय बीमा योजना, विदेशों में काम करने वाले कामगारों के लिए बीमा योजनाएं और परित्यक्त भारतीय महिलाआें की दुरावस्था को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास। इस पहल में मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने राज्य के प्रवासी भारतीयों को लुभाने के लिए किए गए विदेशी दौरों का उल्लेख करना भी नहीं भूलना चाहिए। भारत की प्रतिभाएं 10 के दशक के मध्य से ही पलायन करने लगी थीं। इस पर आम सहमति है कि प्रवासी भारतीयों की मानवीय और वित्तीय पूंजी भारत के लिए, खास तौर पर भारत की उच्च शिक्षा के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए बहुत बड़ी संपदा साबित हो सकती है। प्रवासी भारतीयों के दोहन का सबसे बड़ा स्रेत तो यही हो सकता है कि विदेशों में बसे प्रवासी छात्रों को उनके अपने मातृस्वरूपा शिक्षा केन्द्रों में ही योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।ड्ढr भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के मामले में तो कुछ योगदान हुआ भी है। इस प्रयास को कुछ गति मिलनी शुरू ही हुई थी कि भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने सन 2003 में भारत शिक्षा कोष का गठन कर दिया। विदेशों से शिक्षा के क्षेत्र में मिलने वाले सभी अनुदानों को इस निधि में केन्द्रीकृत करने से इस अभियान के दानकर्ता बहुत हद तक निरुत्साहित हो सकते हैं। इस कदम से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को मिलने वाले अनुदान में नाटकीय रूप में कमी आ गई। वर्तमान सरकार ने इस निर्णय को बदल तो दिया, लेकिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) में आरक्षण के उनके लोक-लुभावने निर्णय के कारण उन्होंने एक मुसीबत से बचने के लिए दूसरी मुसीबत मोल ले ली। यदि हम अपने प्रवासी छात्रों को उनके अपने ही शिक्षा केन्द्रों में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित कर पाते तो सैद्धांतिक रूप में इन वगरे के लोगों के लिए संपूर्ण शिक्षा ही लगभग नि:शुल्क हो सकती थी। इतने जबर्दस्त प्रचार और उत्साह के बावजूद प्रवासी भारतीयों का योगदान अन्य देशों के प्रवासियों के मुकाबले में बहुत ही मामूली है। ऐसा क्यों? एक आंशिक कारण तो यह है कि हम लोगों में दान देने की संस्कृति का अभाव है। दूसरे, जब तक इन संस्थाआें के प्रशासन में नौकरशाही और मंत्रियों की बड़ी भूमिका होगी, प्रवासी दान देने के लिए आगे नहीं आएंगे। शिक्षा संस्थाआें में स्वायत्तता की कमी भी एक बहुत बड़ा बाधक कारक है, जिसकी वजह से प्रवासी छात्र शिक्षा के लिए दान से कतराते हैं। जो अच्छा-खासा दान देने का हौसला रखते हैं, वे चाहते हैं कि इस धन के उपयोग में उनकी राय भी ली जाए और एक ऐसा संस्थागत तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें ऐसे दानकर्ताआें की आवाज भी सुनी जाए। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के लगभग आधे छात्र विदेशों में हैं, लेकिन अपनी इस संस्था में उनकी अपनी कोई भूमिका न होने के कारण वे दान देने से कतराते हैं। उच्च शिक्षा में सुधार के लिए विदेशों में बसी इन भारतीय प्रतिभाआें के दोहन का एक दूसरा तरीका यह भी है कि इन्हें संकाय सदस्य के रूप में शामिल किया जाए। अतीत में कोरिया और ताइवान में यह उपाय बहुत कारगर सिद्ध हुआ था और अब चीन इसी उपाय का भरपूर उपयोग कर रहा है। प्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढ़ियों के बीच संपर्क कायम करने के लिए उच्च शिक्षा काफी हद तक कारगर सिद्ध हो सकती है। दुनियाभर के अनेक अग्रणी विश्वविद्यालय ऐसे कुछ कार्यक्रम तैयार कर रहे हैं, जिनमें उनके अपने ही छात्रों को विदेशों में एक सेमेस्टर बिताने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। उनमें से कुछ छात्र विशेषकर अंडरग्रेजुएट भारत आना चाहते हैं, लेकिन कहां? सुविधाआें की सीमाआें के अलावा भी, हमारी अधिकांश प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थाएं अपने दृष्टिकोण में बहुत संकीर्ण हैं, जिसके कारण विदेशी छात्रों को आकर्षित नहीं कर पातीं। अन्य छात्रों के लिए और क्या विकल्प है? क्या हमें लगता है कि बंगाली मूल का भारतीय प्रवासी छात्र कोलकाता विश्वविद्यालय में और पंजाबी मूल का भारतीय प्रवासी छात्र पंजाब विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के लिए मचल रहा है? भारत सरकार ने इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तीन उपाय किए हैं। एक है, प्रवासी भारतीयोंभारतीय मूल के व्यक्ितयों के विश्वविद्यालय का गठन। दूसरा है, ‘विदेशों में बसे भारतीय मूल के वैज्ञानिकों और टैक्नोलॉजिस्टों के साथ सहयोगी परियोजनाएं’ नाम से एक कार्यक्रम। और तीसरा है, भारत में व्यापक और विविध प्रकार की परोपकारी गतिविधियों के लिए प्रवासी भारतीयों के योगदान की सहायता से भारत विकास निधि का गठन। अफसोस की बात तो यह है कि इनसे कुछ हासिल नहीं होगा। प्रवासी भारतीयोंभारतीय मूल के व्यक्ितयों के विश्वविद्यालय में भी छात्रों और भारत के उन नौकरशाहों के बीच किसी प्रकार के संवाद की गुंजाइश नहीं है। यह स्पष्ट नहीं है कि भारत की उच्च शिक्षा संस्थाआें में जैसी दखलंदाजी होती है, दाखिले, फीस, वेतन और शिक्षाविधि के जैसे कायदे होते हैं, वैसे ही दबाव प्रस्तावित विश्वविद्यालय में भी होंगे। ऐसा है तो जिन छात्रों को कहीं और दाखिला नहीं मिलेगा, वे ही यहां जाएंगे? जहां तक किसी कार्यक्रम के संचालन का प्रश्न है, ऐसे दर्जनों कार्यक्रम दुनियाभर में चल रहे हैं और इन सबका रिकॉर्ड खराब ही रहा है। सहयोगी परियोजनाएं तभी सफल होती हैं, जब इन्हें पेशेवर नेटवर्क के जरिए चलाया जाता है, सरकार की लचर किस्म की किसी बिचौलिए एजेन्सी द्वारा नहीं। एकमात्र सार्थक उपाय यही है कि बेहतर किस्म के शोध विश्वविद्यालय विकसित किए जाएं, जिनमें संकाय सदस्य और सुविधाएं इस स्तर की हों, जो दुनियाभर की सहयोगी संस्थाआें को आमंत्रित कर सकें- लेकिन इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में गहरे राजनैतिक रंग के कारण इसे भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेखक पेन्सिल्वानिया विश्वविद्यालय के भारतीय उच्च अध्ययन केन्द्र में निदेशक हैंड्ढr यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के ‘सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया’ के सहयोग से। लेख द्धह्लह्लश्च ज् ष्ड्डह्यन्.ह्यह्यष्.ह्वश्चद्गठ्ठठ्ठ.द्गस्र्ह्व पर भी उपलब्धं

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