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कामदेव और वेलेंटाइन

वसंत ऋतु को प्रेम की ऋतु माना जाता रहा है। इसमें कामदेव फूलों के पाँच बाणों से जिसे आहत करते थे, वह प्रेम से सराबोर हो जाता था। संकोच और लाज के बीज प्रेम पींगें भरता था। जितने सामाजिक प्रतिबंध और रुकावटें होती थीं, उतना ही प्रेम का भाव तीव्र होता था। उसे शरीर का नहीं, आत्मा का तत्व माना जाता था। स्पर्श से अधिक आँखों के संकेत मादक होते थे। छिपकर भेजे गए संदेश मन को पागल कर देते थे। न जाने कब क्या हुआ कि प्रेम के हाव भाव, तरीके, साधन सब बदल गए। बसंत की गुनगुनी धूप, स्नेहिल हवा, मौसम के नशे का खुमार- सब फीके पड़ गए। वेलेंटाइन बसंत का दुश्मन बन गया। विदेशी संस्कृति से आकृष्ट बच्चों के लिए वेलेंटाइन डे एक दीवानगी बन गया है। बाजार को एक नया व्यवसाय मिल गया है। दिलों की श्रंखला से सजी दुकानों में काडरे की भरमार है, गुलाबों की बिक्री को बढ़ता देख दामों में इजाफा होने लगा है। मॉडर्न हो तो वेलेंटाइन डे जरूर मनाना चाहिए- यही आधुनिकता, प्रेम और नएपन का मानदंड बन गया है। जो इससे अलग है, वह अभागा है। आज प्रेम भावपूर्ण संवेदना की जगह एक जिद में बदल गया है। फिल्में, टीवी, पत्र-पत्रिकाएं प्रेम प्रसंग में खुले शारीरिक चित्रण को आधार बनाए हैं। सबका सार एक है- पीछे पड़े रहो, सब कुछ हासिल हो जाएगा, ना हाँ में बदल जाएगी। ऊंच नीच, उम्र पर सबका अंतर इस प्रेम के आगे तुच्छ है। प्रेमी भूल गए हैं कि एकतरफा प्रेम बेमानी ही नहीं, मानसिक रोग सरीखा है। इसका अंत सबके लिए दुखदायी हो सकता है। उत्सव तो ठीक है, पर वेलेंटाइन से इसका क्या संबंध है्? तीसरी शताब्दी में वेलेंटाइन नामक एक रोमन संत था। वहाँ के बादशाह शादी के खिलाफ थे, संत छिपकर युवाआें का विवाह करवा देते थे। पता चलने पर बादशाह ने उन्हें फाँसी की सजा दे दी। इसके अलावा जो कहानियाँ हैं, वे प्रेम से कतई नहीं जोड़ी जा सकतीं। जैसे संत डरावने भेड़ियों को भगाते थे अथवा फ्रांस में प्रचलित कहानी के अनुसार इस नाम के संत ने दो उन बच्चों को जीवनदान दिया जो कत्ल कर दिए गए थे। यही नहीं अमेरिका में सबसे अधिक वेलेंटाइन कार्ड अध्यापकों को भेजे जाते हैं। कभी कभी माता-पिता या अन्य लोगों के प्रति भी कार्ड द्वारा प्रेम जताया जाता है। युवा पीढ़ी एक आेर तो बाजार की चमक-दमक और नए चलन से आकर्षित हुई, दूसरे जितना कुछ लोगों ने विरोध किया उतना ही इन्होंने विद्रोह। अपने को संस्कृति का रक्षक और पालक समझने वालों का विरोध होना ही चाहिए। पर यह भी उतना ही सच है कि भावुक किशोरों और उत्साही युवा पीढ़ी को प्रेम की गंभीरता समझनी होगी। एक का प्रेम दूसरे के जी का जंजाल नहीं बनना चाहिए, यह भाव दोनों तरफ होना जरूरी है। ऐसा न हो कि इकतरफ उत्साह थाने पहुंचा दे।ं

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