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आरक्षण की दुधारी तलवार

विभिन्न सरकारों ने दुधारी तलवार की तरह से आरक्षण लागू कर रखा है। शिक्षण संस्थाआें में और सरकारी नौकरियों में भी। अब तो प्राइवेट संस्थाआें में भी आरक्षण का मसला जोरों पर है। इतना सब किसलिए? क्या आरक्षण के हिमायती नेता कोटे से आए अयोग्य डॉक्टर से अपने शरीर की चीरफाड़ करवा लेंगे। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं आरक्षण का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। समझने की बात है बाबा भीमराव अम्बेडकर ने आरक्षण की बात योग्य विद्यार्थियों को आगे लाने के लिए की थी ताकि समाज की अगुवाई कर रहे लोग योग्य हों, शिक्षित हों, सभ्य हों, पदासीन हों। किन्तु लानत है नेताआें पर। इन्होंने आरक्षण का क्या से क्या बना डाला? कोटे से आया 33 प्रतिशत का जो विद्यार्थी, जिसे सरकारी नौकरी भी मिल जाती हो समाज का कितना भला करेगा नेता ही बता सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में स्वयं ही हस्तक्षेप करना चाहिए। बाबा साहब की भावना को समझना चाहिए सिर्फ शब्दों को नहीं।ड्ढr तरुण कुमार जैन, रामा ब्लॉक, दिल्ली मुझे भी लो स्नेह की छाया में अपराजिता स्नातक का लेख- बच्चों और बूढ़ों को.. (संदर्भ: 30 जनवरी हिन्दुस्तान रीमिक्स) हमारा पहला नमन सरोजनी को, जो बच्चों और बूढ़ों को समर्पित हैं। दूसरा नमन अपराजिता को जिन्होंने अच्छे व्यक्ितत्व का पाठकों से परिचय कराया। और तीसरा नमन ‘हिन्दुस्तान’ संपादक मंडल को। सरोजनी से आग्रह है कि अपने स्नेह की छाया में इस (86 वर्षीय) को भी शामिल कर लें। एक बच्चे के तौर पर।ड्ढr डॉ. आेम प्रकाश शर्मा, से. रोहिणी, दिल्ली पहेली भ्रष्ट नेताओं की इस देश की सामान्य जनता इस पहेली का उत्तर नहीं खोज पा रही कि हर संचार माध्यम द्वारा सप्रमाण भ्रष्टाचार की पोल खोलकर राजनीतिबाजों की बखिया उधेड़ी जाती है, फिर भी वे संसद तक कैसे पहुंच जाते हैं। डाकुआें, कैदियों, व्यापारियों, कर चोरों की पकड़-धकड़ के दौरान उनसे प्राप्त डायरियों में सफेदपोश नेताआें और नौकरशाहों के नाम मिलते हैं, लेकिन वे नाम अखबारों, टीवी, रेडियो में क्यों नहीं बताए-छापे जाते, जबकि अपराधियों के नाम बता दिए जाते हैं? इस पहेली का उत्तर भी सामान्य जन नहीं खोज पाते कि कुएं के मेंढक राजनीतिबाजों के जनविरोधी विचारों को दृश्य-श्रव्य माध्यम खूब उछालते हैं, लेकिन उनके कारण सामान्य जन को जो कष्ट उठाने पड़ते हैं, उसका दंड उन राजनीतिबाजों को तुरंत क्यों नहीं दिया जाता। क्या राजनैतिक गलियारों में सारे राजनीतिबाज भाई-भाई हैं? जाति, धर्म, प्रांत, क्षेत्र की राजनीति करने वालों ने इस देश में बिखराव पैदा कर दिया है, उनके पीछे सारा संसार-माध्यम कैमरे-कलम उठाए क्यों भागता फिरता है? क्या नैतिकता, सत्य, सदाचरण केवल सामान्य जन के हिस्से में आते हैं? क्या सामान्य जन ऐसे राजनीतिबाजों के लिए दाल-रोटी बना रहेगा?ड्ढr सुकुमार, नसीरपुर रोड, द्वारका, नई दिल्ली किसान की राह नहीं आसान कहावत है कि ‘गंजी कबूतरी और महल में डेरा’ यही हाल है चुनावी बजट में किसानों को पटाने का। आज भारतीय किसान सुस्त कृषि नीति के साथ-साथ खराब मौसम की मार भी झेल रहा है। आज भी देश के 73 फीसदी कृषक महाजनों पर निर्भर हैं। पढ़े लिखे होने के कारण 27 फीसदी किसान ही सरकारी क्षेत्र की वित्तीय सहायता को पाने में सफल हो रहे हैं। विदेशी बैंकों की विशाल नेटवर्क शाखाएं तो कॉरपोरेट क्षेत्रों में ही मक्खन निकाल रही हैं। और देशी बैंकों की शाखाआें का विशाल नेटवर्क गांवों तक पहुंचते-पहुंचते ही हांफ रही है। नाबार्ड और ग्रामीण बैंकों के अथक प्रयासों से भी गरीब कृषकों की गाड़ी पटरी पर नहीं आ रही। कोई भी खुदगर्ज किसान ऋणमाफी, उर्वरक-सब्सिडी व ब्याजदर में कमी को उतावला नहीं है। सही कृषि नीति व मौसम की मेहरबानी हो तो वह भी जमीन से सोना निकाल सकता है।ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली माया का जादू माया का जादूड्ढr हो चुका है बेकाबूड्ढr जनता ने सभी को आजमायाड्ढr लेकिन हाथ कुछ न आयाड्ढr ऐसे में क्या करे जनता बेचारीड्ढr अब बसपा की बारीड्ढr माया ने की है नए हाथी की सवारीड्ढr वेद, मामूरपुर, नरेला, दिल्ली

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