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बाघों की गणना का तरीका संदेहास्पद

देश के कई रायों ने भारतीय वन्यजीव संस्थान की लुप्तप्राय वन्यजीव बाघांे की गणना के संबंध में हाल ही में जारी आंकडों पर गहरा संदेह जताया है। पर्यावरण मंत्रालय की दो दिवसीय कांफ्रेंस में भाग लेने आए विभिन्न रायों के कुछ वरिष्ठ वन और वन्यजीव अधिकारियों ने बुधवार को बाघों की गणना में अपनाए जा रहे नए तरीकों के प्रति गहरी शंका जाहिर की है। गौरतलब है कि रिपोर्ट में देश में बागों की संख्या 1500 से भी कम बतायी गई है। असम के मुख्य वन्यजीव संरक्षक एम सी माकड ने कहा कि गणना के लिए अपनाई गई नई प्रणाली में गणना के समय बाघ का दिखना जरुरी नहीं है। इसमें कुछ मापदण्ड तैयार किए गए हैं जिसके आधार पर बाघों की संख्या पता लगाना है। उन्होंने कहा कि पुरानी पद्वति में पद चिन्हों के आधार पर बाघों की गणना की जाती थी और उसमें भी गलती होने की संभावना बनी रहती थी। लेकिन नए तरीके में तो और बडी गड़बड़ी होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि ताजा आंकडे में उनके राय में 2001 की पिछली गणना के 264 बाघों की तुलना में मात्र 70 बाघ रहने का आंकडा है और उन्हें इस आंकडे पर गहरा संदेह है। बिहार के मुख्य वन्य जीव संरक्षक बी एन झा ने भी संस्थान द्वारा गणना के लिए अपनाए गए नए तरीकों पर संदेह जताया है। उन्होंने कहा कि उनके राय के घने वनों में कैमरा निगरानी पद्धति द्वारा की गई गणना भी पूरी तरह से संदेहास्पद है।

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