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एक राजनैतिक बर्ड फ्लू

एक राजनैतिक दल की मुर्गी से मैंने कहा- ‘सावधान रहना। बर्ड फ्लू चल रहा है। कहीं ऐसा न हो कि पार्टी के मुखिया तेरी गर्दन मरोड़ कर मिट्टी में दबा दें।’ मुर्गी नाराज हो गई। झल्लाई और बोली, ‘तुमने मुझे समझ क्या रखा है? मैं पार्टी का पहिया हूं। मेरे बिना पार्टी आगे बढ़ नहीं सकती है।’ मैंने कहा, ‘हे मुर्गी! नाराज न हो। मैं तेरा मान मर्दन नहीं करना चाहता, बल्कि सचेत करना चाहता हूं ताकि बर्ड फ्लू के धोखे में पार्टी तुझे काटकर न खा जाए। जब तक यह बर्ड फ्लू की आंधी चले, तब तक घर से बाहर न निकलना। कई पदाधिकारियों की नजर है तुझ पर।’ मुर्गी सचमुच मेरे इशारे को समझ कर सुरक्षित स्थान की आेर चली गई। इस बार परिसीमन होने से अनेक मुर्गियों के सुरक्षित स्थान भी असुरक्षित हो गए हैं। जो मुर्गियां अपनी सुरक्षा का दावा कर रही थीं, वे यकायक भयभीत हो गई हैं। सब जगह मुर्गियां हलाल होती हैं। मुर्गियों को पार्टी प्रमुख ढूंढ़-ढूंढ़ कर शहीद कर रहे हैं। पार्टी हित की आड़ में अपना हित साध रहे हैं। पार्टी के प्रमुख ने ऐलान किया, ‘चुनाव की निकटता देखते हुए हमें एक सौ एक मुर्गियों की बलि चाहिए। तत्काल क्षेत्रों में जाकर मुर्गियां लाएं।’ मुर्गियों को पता चला तो वे चौकन्नी हो गईं। इधर-उधर छुपकर जान बचानी चाही। एक दिन एक सेनापति के हाथ एक मुर्गी लग गई। बोला, ‘कहां से आ रही हो मुर्गी?’ मुर्गी ने गर्व से कहा, ‘पार्टी की मीटिंग में से।’ सेनापति बोला, ‘आआे मेरे साथ। फार्म हाउस तक चलना है।’ मुर्गी ने कड़क कर कहा, ‘मुझे कहीं नहीं जाना। पॉलट्री फार्म जाना है।’ मुर्गी का रौब देख सेनापति ताव खा गया, ‘पॉलट्री फार्म पर क्या करेगी?’ मुर्गी उवाच, ‘सोने का अंडा दूंगी पार्टी के लिए।’ सेनापति कहने लगा, ‘पहले मेरे साथ चल, वहां भी पार्टी का ही काम है।’ मुर्गी ने हाथ छुड़ाया, ‘दूर से बात कर। सन सत्तर से पार्टी के सेवा कर रही हूं। कई सेनापति और सिपहसालार आए और गए। एक पंख भी नहीं उखड़ा मेरा किसी से।’ सेनापति बोला, ‘इसीलिए तू अभी तक मुर्गी है। कई मुर्गियां तो मोर बनकर घूम रही हैं। आगे बढ़ने के लिए त्याग करना पड़ता है।’ इतनी देर में वहां मोटी मुर्गी आई। सेनापति ने कहा, ‘देख मोटी, इसे समझा नहीं तो मैं इसका बाजा बजा दूंगा। पार्टी प्रमुख की सेवा में पांच मुर्गियां चाहिए। चार मिल चुकी हैं, वे पहले ही सेवा हेतु पहुंच गई हैं। यह नखरे कर रही है।’ मोटी मुर्गी बोली, ‘कहो तो मैं चलूं।’ सेनापति बोला, ‘नहीं अभी तुम्हारी जरूरत नहीं। नई मुर्गी की डिमांड थी।’ मोटी मुर्गी बोली, ‘मैं जल्दी में हूं। जरूरत हो तो फोन करना।’ इसी दरम्यान छोटी मुर्गी उड़ गई। सेनापति हाथ मलता रह गया। वह दूसरी मुर्गी की तलाश में चला गया।

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