महाराष्ट्र में जिंदा रहने की जद्दोजहद में ‘तमाशा’ - महाराष्ट्र में जिंदा रहने के लिए जद्दोजहद कर रहा है ‘तमाशा’ DA Image

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महाराष्ट्र में जिंदा रहने के लिए जद्दोजहद कर रहा है ‘तमाशा’

तीखे व्यंग्य, अभिनय और नृत्य-संगीत के लिए मशहूर महाराष्ट्र की लोककला ‘तमाशा’ संकट में है। क्योंकि उसे चलाने वाले कलाकार संकट में हैं। इसका अहसास वहां की सरकार से लेकर अभिनेता सदाशिव राव अमरापुरकर व गैर सरकारी संगठनों को हो रहा है। इसलिए राज्य के 25 हजार तमाशा-कलाकारों की आजीविका और उनके सम्मान के लिए योजनाएं चलाई जा रही हैं। पर इसके परिणाम अभी आने बाकी हैं। तमाशा-कलाकारों की मदद में जुटे अमरापुरकर का कहना है, ‘वे मजबूरी में मानवीय गरिमा के प्रतिकूल काम करते हैं। उनके बच्चे यह काम नहीं करना चाहते। पर क्या करें उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ता है। उनके पास बताने के लिए पिता का नाम नहीं होता। ‘दूसरी तरफ, उन्हें राशन कार्ड या अनुदान देने के सरकारी दावे हकीकत से परे लगते हैं।’ तमाशा के बदलते रूप का जिक्र करते हुए मुंबई में भारतीय कला के विशेषज्ञ प्रोफेसर प्रकाश खडगे का कहना है, ‘आजकल पढ़े-लिखे संपन्न लोगों में तमाशा की लावणी लोकप्रिय हो रही है। हम मुंबई विश्वविद्यालय में इसका प्रशिक्षण देते हैं। इसमें आमजन के लिए चलने वाले ढोलकी फड़ाचा तमाशा के बजाय विशिष्ट जनवाले बारीशा तमाशा को अपनाया जा रहा है। तमाशा के साथ छोटी जाति व अश्लीलता की जो बदनामी जुड़ी थी अब वह जाती रही है। लावणी के साथ जो ऐंद्रिकता जुड़ी हुई थी वह कम हुई है। इसलिए बड़ी जाति की लड़कियां भी लावणी सीख रही हैं।’ ‘लेकिन यह तो तमाशा का शहरीकरण हुआ। लावणी तमाशा का शुद्ध रूप नहीं है, क्योंकि तमाशा के थियेटर में द्विअर्थी संवादों के माध्यम से बहुत सारा व्यंग्य किया जाता रहा है। आजकल वह पक्ष घटता जा रहा है।’ ऐसा मानते हैं तमाशा के छाया चित्रकार संदेश भंडारे। उन्होंने हाल में अपने चित्रों पर आधारित एक पुस्तक के माध्यम से तमाशा की कथा कही है। ढोलकी वादक की अंगुलियां और नशे में झूलता उनका निराश मन भंडारे की कथा की पुष्टि करता है। जिस प्रहलाद घोटकर की उंगलियों ने पूरे सभागार को थिरकने पर मजबूर कर दिया था वह सभागार से बाहर हर किसी के आगे याचक बने घूम रहे थे। ‘साहब दो बच्चे हैं, महीने में जैसे-तैसे दो हजार कमा पाता हूं। अगर आप जैसे लोग कृपा न करें तो जीवन नहीं चलेगा।’ भंडारे इस लोककला के साथ जुड़ी अपमानजनक स्थितियों की बाबत कहते हैं, ‘घुमंतू कोल्हाटी और महार जाति के इन लोगों से बाबा साहेब ने तो तमाशा छोड़ देने को कहा था। वे चाहते भी हैं पर क्या करें?’

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  • Web Title: महाराष्ट्र में जिंदा रहने की जद्दोजहद में ‘तमाशा’