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एजेंट के भरोसे लेखकों की दुनिया

दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किरण नागरकर से मुलाकात हुई। वह मराठी के मशहूर लेखक हैं। अंग्रेजी में उन्होंने एक उपन्यास ‘ककोल्ड’ लिखा है। मुझे वह किसी भी हिन्दुस्तानी का अंग्रेजी में लिखा बेहतरीन उपन्यास लगता है। सोचने को मजबूर करता है वह। मेरे जेहन में ‘आउटलुक’ में शीला रेड्डी का वह लेख भी है, जिसमें उन्होंने हिन्दुस्तान के नए लेखकों को मिलने वाली जबर्दस्त एडवांस रॉयल्टी पर लिखा है। ये रॉयल्टी अपने बड़े प्रकाशक मसलन, पेंगुइन-वाइकिंग, हारपर कॉलिंस, रूपा और रोली बुक्स वगैरह दे रहे हैं। उन्हें आने वाले उपन्यास का एक भी लफ्ज लिखे बगैर ही 50 लाख तक मिल रहे हैं। ये अमेरिका और इंग्लैंड या किसी यूरोपीय देश में मिलने वाली रकम से ज्यादा है। ये पैसा अंग्रेजी के लेखकों को ही मिल रहा है। ये अपनी राष्ट्रीय भाषा हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा के लेखकों को नहीं मिल रहा है। इतना तो साफ है कि इस हिन्दुस्तान में अंग्रेजी ही राज करती है। बुक फेयर में दो तिहाई स्टॉल अंग्रेजी के ही थे। हिन्दी और उर्दू तो बेचारी बुरी तरह पिछड़ी हुई थीं। बाकी भाषाआें को कौन पूछता है? दरअसल, लेखकों और प्रकाशकों की दुनिया बदल गई है। इस कदर कि पहचानी नहीं जाती। हिन्दुस्तान मंे अंग्रेजी लेखन की शुरुआत करने वाले मुल्कराज आनंद, आर. के. नारायण और राजा राव को ऐसे प्रकाशक ढूंढ़ने पड़े थे, जो उनकी रचनाआें को किसी तरह छाप सकें। साहित्य के हलकों में उनकी चर्चा जरूर हो जाती थी, लेकिन ज्यादा पैसा नहीं मिल पाता था। लेखकों की इस दुनिया मंे एजेंट को कोई नहीं जानता था। मैंने भी इस सिलसिले में सिर्फ कर्टिस ब्राउन का नाम सुना था। कहा जाता था कि एजेंट आपके काम के लिए बेहतर प्रकाशक तलाशता है। फिर आपकी रॉयल्टी में से अपना हिस्सा ले लेता है। मैं खुद कभी किसी एजेंट के चक्कर में नहीं पड़ा। खैर, मुझे कभी अच्छा प्रकाशक तलाशने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मेरी किताबों को बेचने से जो 8-10 फीसदी मिल जाता था, मैं उसी से खुश हो लेता था। आज एजेंट बेहद ताकतवर हो गया है। लेखक उसके भरोसे हो गए हैं। वही प्रकाशकों से ज्यादा पैसा दिलाता है। वही एडवांस रॉयल्टी का इंतजाम करता है। अब ये पूरा कारोबार चकलाघर सा हो गया है। प्रकाशक चकला मालिक जैसे हो गए हैं। एजेंट भड़ुए जैसे हैं। लेखक धंधा कर रही औरतों की तरह हैं। नए लेखक नया माल हैं। उन्हें ही सबसे ज्यादा दाम मिलता है। प्रकाशक अपने माल को चमकाते हुए पेश करते हैं। मशहूर लेखकों से तारीफ लिखवाई जाती है। ये सब रैकेट हो गया है। आप इस तरह का माहौल कोलकाता के सोनागाछी, मुंबई के कमाठीपुरा और हैदराबाद के मेहबूब की मेंहदी में देख सकते हैं। रूसी करंजिया वह शुक्रवार को चल दिए। उस दिन 1 फरवरी थी। उनकी उम्र थी साल। लेकिन ये वो रूसी नहीं थे जिन्हें मैं कम से कम दस साल पहले जानता था। मैं जब आखिरी बार उनसे मिला था तब एक होटल में बड़ा रिसेप्शन था। उनकी बेटी रीता ने चेतावनी देते हुए कहा था, ‘अंकल, वह आपको पहचानेंगे नहीं।’ वहां भी वह बेहतरीन ड्रेस में थे। उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया था। उनकी आंखों की चमक से मैंने समझ लिया था कि वह मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं। मुझे सब कुछ समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी। मेरी बीवी को भी यही अलझाइमर बीमारी थी। उसमें याददाश्त पर असर पड़ता ही है। मुंबई मंे नौ साल रहा था। उस दौरान 15 दिन में एक बार तो मुलाकात हो ही जाती थी। कभी-कभी हम लंच साथ ही करते थे। कभी-कभी वह मुझे अपने घर ड्रिंक पर बुला लेते थे। उनका टेबलॉयड ‘ब्लिट्ज’ तो हर हफ्ते की खुराक था ही। इसी तरह दोसू करका का ‘करंट’ और बाबूराव पटेल की ‘मदर इंडिया’। अपने अखबार के जरिए रूसी और दोसू में खूब नोंकझोंक होती रहती थी। रूसी वामपंथी थे और दोसू दक्षिणपंथी। बाबूराव पटेल हिन्दुत्व को उभारते रहते थे। मैं इन तीनों अखबारों-पत्रिकाआें को ही पीत पत्रकारिता मानता था। ये कभी बहुत ज्यादा नहीं बिके। इसीलिए विज्ञापन भी नहीं मिले। आखिरकार तीनों ही बंद हो गए। तीनों ने हिन्दुस्तानी पत्रकारिता पर अपना असर छोड़ा। रूसी का असर कुछ ज्यादा ही था। लेकिन उनके बीमार होने से पहले ही ‘ब्लिट्ज’ चल बसा था। एक बार संसद में उनकी जमकर खिंचाई हुई थी। इधर किसी ने उसका जिक्र नहीं किया। जब भी कोई उनकी खिंचाई करता था, तो वह शांत ही रहते थे। एक ही बार मैंने उन्हें उखड़ते देखा था। दरअसल, उनकी बिंदास दोस्त आेल्गा टेलिस की दोस्ती जॉर्ज फर्नाडिज से बढ़ गई थी।ं

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