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सिख समुदाय पंजाब में अल्पसंख्यक नहीं : कोर्ट

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पिछले साल दिये गये उस फैसले पर शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय ने भी अपनी सहमति जताई है जिसमें कहा गया था कि सिख समुदाय पंजाब में अल्पसंख्यक नहीं है। मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय खंडपीठ ने उक्त दोनों उच्च न्यायालयों द्वारा वर्ष 2007 में दिये गये फैसले को निलंबित करने से मना कर दिया। खंडपीठ ने यह भी कहा है, ‘‘यह कहना ही अपने आप में अनुचित लगता है कि पंजाब में सिख समुदाय अल्संख्यक है।’’ न्यायमूर्ति बालाकृष्णन के अलावा जस्टिस सीके ठक्कर और जस्टिस आरवी रवीन्द्र की इस खंडपीठ ने पंजाब सरकार को उच्च न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाने के कारण नोटिस जारी किया है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और पंजाब निवासी शैल मित्तल की ओर से इस संबंध में उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। न्यायालय ने मित्तल को भी नोटिस जारी किया है। उल्लेखनीय है कि पंजाब सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर ‘एसजीपीसी’ द्वारा चलाये जा रहे शिक्षण संस्थानों में सिखों को पचास फीसदी आरक्षण दिये जाने की बात कही थी। मित्तल ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाया था और उच्च न्यायालय में इस संबंध में एक याचिका दायर की थी। ‘एसजीपीसी’ की ओर से जिरह करने वाले वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने उच्च न्यायालय के फैसले को गलत बताया और उसे निरस्त करने की मांग की। उन्होंने कहा, ‘‘नामधारियों, निरंकारियों, राधास्वामियों और यहां तक कि डेरा सच्चा सौदा को मानने वालों को सीख मानकर उच्च न्यायालय ने गलत तरीके से सिखों को अल्पसंख्यक दर्जा देने से मना कर दिया।’’ साल्वे ने कहा कि अन्य पंथों को मानने वाले सिख जीवित गुरुओं की पूजा करते हैं जबकि सिख धर्म को मानने वाले सिर्फ दस शहीद गुरुओं और गुरु ग्रंथ साहिब का पालन करते हैं। साल्वे ने कहा कि उक्त सभी समुदायों को सिख मानकर न्यायालय ने सिखों की संख्या में इजाफा कर दिया और उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने से मना कर दिया। खंडपीठ ने कहा है कि यदि राज्य सरकार की दलीलों को माना जाये तो भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे क्योंकि वे भी कई समुदायों में बंटे हैं।

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