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दो सौ साल पहले मराठों से मिली जमीन पर दावा

भले ही यह अजीबोगरीब लगे लेकिन सच है। एक व्यक्ित ने आगरा में 100 करोड़ रुपये कीमत की 10 एकड़ जमीन की मिल्कियत का दावा किया। उसका कहना है कि यह जमीन 200 साल पहले मराठों ने उसके पूर्वजों को भेंट में दी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसके दावे को सही ठहराते हुए कहा कि यह जमीन वाकई में इब्राहिमुद्दीन की मिल्कियत है। हाईकोर्ट के निष्कर्ष से सकते में आयी केंद्र सरकार ने आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। फिलहाल यह जमीन आगरा के छावनी बोर्ड के कब्जे में है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एच.के. सेमा और न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की एक पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम की यह दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट के 1अप्रैल 2007 के आदेश पर रोक लगा दी कि जमीन पर इब्राहिम का दावा हास्यास्पद है। पीठ ने इब्राहिम से केंद्र की अपील का जवाब देने को कहा है। आगरा के एक व्यापारी इब्राहिम का दावा है कि यह जमीन उसे पूर्वजों से विरासत में मिली। पूर्वजों को यह जमीन सन 1800 में मराठों ने दान में दी थी। उसने तो यह तक दावा किया कि मिलिट्री के जमीन-जायदाद के अधिकारी वास्तव में उसके किराएदार हैं क्योंकि उसके पूर्वजों ने 22 रुपये मासिक किराए पर सेना को यह जमीन दी थी।

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