DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बर्ड-फ्लू-ग्रस्त चूजों से भयभीत चूाादिल सरकार

हमारे ऐसे एशियाई देशों में पहुँचने में उन्नीसवीं सदी में हुई यूरोप की औद्योगिक क्रांति के रेलों और इस्पात भट्टियों सरीखे उत्पादों को 120 बरस लग गए थे। टेलीफोन को हम तक आने में एक पूरी सदी लगी। हवाई जहाज और रेडियो का आविष्कार 20वीं सदी में हुआ, पर वे भी हम तक 60 बरस बाद पहुँचे। लेकिन पर्सनल कम्प्यूटर और नई सूचना प्रसार तकनीकी सिर्फ दो दशकों में ही हमें मिल गई और आज तो हम अमेरिका या यूरोप के बाजारों में उतरे ताजातरीन मोबाइल या लैपटॉप मॉडल चंद महीनों के भीतर अपने घरेलू बाजार से खरीद कर सूचना राजपथ से जुड़ सकते हैं। जाहिर है कि नई तकनीकी के आविष्कार के बाद नवीनतम ज्ञान के शेष विश्व तक पहुँचने के बीच का पुराना अंतराल अब लगभग खत्म है, लेकिन सूचना और ज्ञान के भण्डार से सीधे जुड़ जाने के बावजूद हमारे देश की राजनीति अधिक ज्ञानमूलक या वयस्क कतई नहीं बन पाई है। पिछले कई महीनों से इस बेहूदा धमाचौकड़ी से हमारे अखबार तथा टी.वी. चैनल रंगे हुए हैं कि कैसे असम की राजधानी में झारखंड की आदिवासी महिला का सरेआम चीरहरण हुआ, पंजाब में भोजपुरी फिल्म दिखाने वाले छविगृह में बम विस्फोट हुआ और मुंबई तथा नासिक में गैर-मराठियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया, लेकिन फिर भी ऐसी असंवैधानिक हरकतों पर कोई देशव्यापी शोक और चिन्ता की लपटें उठती नहीं दिखतीं। बर्ड-फ्लू के मारे बंगाल से लेकर ‘बर्ड-फ्लू’ के कथित चूजों के बरपाए कहर से पीड़ित महाराष्ट्र-बंगाल तक लगता है, कहीं एक ऐसी आत्मघाती प्रवृत्ति देश के भीतर मौजूद है, जिसके चलते असम से पंजाब तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर प्रांत भूमिपुत्रों और स्थानीय संस्कृति के नाम पर अपने गैर-प्रांतीय बंधुआें को बाहर खदेड़ने पर आमादा है। क्या हम जैसे जो भारतवासी 2050 तक इस प्रायद्वीप में मरेंगे, वे आज की तारीख में विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि ऐसे माहौल में वे अपनी राष्ट्रीय पहचान समेत मरेंगे? या कि हमें समय रहते दूर परदेस जाकर मरने का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए, ताकि हम भूमिपुत्रों की विरासत बन चुके महाराष्ट्र या बंगाल या असम या पंजाब में परदेसी होकर मरने की पीड़ा से बच सकें? हमारी राय में अलगाववाद पोसने वाला क्षेत्रवाद और जातिवाद दोनों गलत हैं, टी.वी. छवियाँ गवाह हैं कि उससे गरीबों को भी फर्क पड़ता है। मान्य नेता क्रांति न भी लाते तो भी उन्हें क्या तंत्र को ऐसा नहीं बनाए रखना चाहिए था, कि प्रत्येक देशवासी सामथ्र्यवान् बनने पर तंत्र के भीतर घुस सके और कभी-कभार तंत्र को बदल सके? उत्तर प्रदेश या बिहार की गरीबी वे नहीं मिटा पाए, पर अपने-अपने राज्यों में संविधान द्वारा दी गई संचरण की, अभिव्यक्ित की और अवसर की आजादी को तो वे हर भारतवासीके लिए खुली रख सकते थे? जाति या क्षेत्र के आधार पर वर्तमान् तंत्र में तरक्की के खुले द्वार बाहरिया बना दिए गयों के लिए बंद करने का अर्थ है कि तरक्की के लाभांश प्रांत के निठल्लों को भले ही मिलें, लेकिन उन मेहनतकश प्रवासियों के हाथों कतई नहीं जाएं, जिन्होंने पीढ़ियों से, वषरे से प्रांत की तरक्की को पसीना बहाया है। सच तो यह है कि हर प्रांत में जो सबसे अधिक गरीब तबका है, वही कश्मीर से कन्याकुमारी और अमृतसर से आरा तक सबसे ज्यादा बेरोजगार और बीमार है, और अपनी (बहुत कम) आमदनी का लगभग 60 प्रतिशत दवा-दारू पर खरचने को बाध्य है। आंध्र से लेकर महाराष्ट्र तक में भी इधर ऋणग्रस्तता के साथ गरीब किसानों द्वारा आत्महत्याएँ बढ़ी हैं। कोई भी जिम्मेदार सरकार उन तमाम खराब परिस्थितियों के निवारण को कुछ उपाय सोच कर रखती है, जो देश को ग्रस सकते हैं। इसलिए आज के भारत में केन्द्र तथा राज्य, दोनों को स्वास्थ्य और अन्न उत्पादन से जुड़े संकटों की तैयारी करके रखनी चाहिए जो कि आ सकते हैं। पर हमारे नेता प्रेमचंद के शतरंज के खिलाड़ियों की तरह सचमुच के मनुष्य के हित की बजाए खेल-खेल में ही खूनी तलवारें खींचते हैं। परमाणु करार के विरुद्ध सरकार गिराने तक को तैयार माकपा के बंगाल में बर्ड फ्लू आया तो जग जाहिर हुआ कि कैसे बरसों से जनवादी नारेबाजी कर रही वाम सरकार के पास न तो ऐन वक्त पर रोगग्रस्त पक्षियों को वैज्ञानिक तरीके से मारने के सही इंतजाम थे, न ही पर्याप्त मात्रा में बर्ड-फ्लू निवारक वैक्सीन! देश को सचमुच आंदोलित करने लायक मुद्दों को छोड़ कर हर किस्म का आंदोलन आज देश में जायज है : हवाई अड्डा कर्मचारियों का आधुनिकीकरण के खिलाफ, बैंक कर्मियों का कम्प्यूटरीकरण के खिलाफ, छात्रों का नकल पर प्रतिबंध के खिलाफ, महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश बिहार के गरीबों की संपत्ति की शिवसेना द्वारा तोड़फाड़ जायज है। बिहार में पिछड़ी जातियों का आक्रोश सिर्फ पिछड़े गरीबों पर उतारने वाली रणवीर सेना जायज है, छत्तीसगढ़ में बंदूकधारी माआेवादियों का निहत्थे गाँव वालों को मारना जायज है। नासिक और गुवाहाटी की ईष्र्या जायज है, अबू आजमी और ठाकरे बंधुआें की धमकियाँ जायज हैं। नाजायज है, तो सिर्फ वह जड़ों से विस्थापित गरीब, जो अपनी जमीन जाने कब गँवा चुका है और पेट का गढ़ा भरने को बाल-बच्चों सहित एक अशरीरी प्रेतात्मा की तरह ठौर-ठौर भटक तथा दुरदुराया जा रहा है। यह ठीक है कि भविष्य का सौ प्रतिशत बीमा संभव नहीं, लेकिन बीमा कम्पनियों की तादाद प्रमाण है कि भविष्य सौ फीसदी अनिश्चित भी नहीं होता। इसलिए हमारी राय में अगर राज्य सरकारें किसानों, मजदूरों और उनके परिवारों को घरेलू भुखमरी और प्रवास में क्षेत्रीय गुंडों और आतंकियों से सचमुच बचाना चाहती है, तो सबसे पहले घरेलू स्तर पर ग्रामीण पलायन को यथासंभव रोकना होगा। गरीब प्राय: महानगरों में जाने को इच्छुक नहीं, बेरोजगारी से बाध्य होते हैं। उनकी रोजगार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को लेकर युद्धस्तरीय विमर्श और ठोस कार्रवाई करनी होगी। गरीबों की मदद के नाम पर क्रिकेट मैच या दौड़ें करवाने से कहीं अधिक कष्टकर और श्रमसाध्य है, आम नागरिक को उसके अपने गृहप्रदेश में बेहतर रोटी-कपड़ा-मकान, साफ पर्यावरण और जीने लायक और ढाँचागत सुविधाएं दिलाना। गरीबों के मसीहाआें और युवाहृदय सम्राटों को यह बात गले-तले उतारनी ही होगी। शायद बिहार, महाराष्ट्र या कर्नाटक में क्षेत्रीयता के उफान के यह क्षण देश के लिए इन सवालों पर ईमानदार अंत:परीक्षण का एक अवसर भी हैं, कि क्या वजह है कि केन्द्र की सरकार राज्य सरकारों से नरेगा या सर्वशिक्षा जैसी जन-कल्याण योजनाएँ ईमानदारी से लागू कराने, शहरों में विस्थापितों की स्लम-बस्तियाँ हटाकर गरीबों को वैध आवास देने की योजनाआें पर अमल नहीं करा पा रही? वोट-बैंकों की चिंता में डूबी राज्य सरकारें केन्द्र के दबाव भलमंसाहत से प्राय: स्वीकार नहीं करतीं, लेकिन आज जैसी अस्थिरता के क्षणों में केन्द्र को ऐसे राष्ट्रीय मसलों पर अपनी केंद्रीयता का महत्व क्या पुनर्जीवित नहीं करना चाहिए? यह सही है, कि महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था राज्य सरकार के आधीन है, पर क्या यह भी सच नहीं कि आजादी के बाद से संविधानप्रदत्त संचरण के हक का लाभ उठा कर एक विशाल आबादी रोजी-रोटी की जायज तलाश में देशभर में इधर से उधर जाती रही है। साठ साल बाद क्या आज पंजाब को पंजाबियों, महाराष्ट्र को मराठियों या असम को असमियों के लिए ही आरक्षित प्रांत माना जा सकता है?राज्यों में केन्द्रीय हस्तक्षेप ठीक नहीं, इसलिए वह जितना कम हो अच्छा है। लेकिन अगर प्रांतों में वोट की राजनीति के दबाव उपजे क्षुद्र नेता अलगाववाद की ताकतों के पक्ष में उतरने लगें तो उन पर कड़ी रोक लगाने की इच्छा तो केन्द्र में दिखनी ही चाहिए, वर्ना वह केन्द्र कैसा और किसका?ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: बर्ड-फ्लू-ग्रस्त चूजों से भयभीत चूाादिल सरकार