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ऐतिहासिक माफी के लम्हों में टेलीविजन

इतिहास को बनते हुए देखना दुर्लभ तो है ही, अपने आप में दिलचस्प भी होता है। इस महीने की 13 तारीख को बहुत से ऑस्ट्रेलियाई लोगों ने अपनी आंखों से इतिहास बनते देखा। लोगों तक उन ऐतिहासिक लम्हों को पहुंचाने का पूरा श्रेय जाता है इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को। अवाम ने देखा कि उनके नए प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से माफी मांग रहे हैं। माफी भी उन कृत्यों के लिए, जिनके वे सीधे जिम्मेदार नहीं हैं। ऑस्ट्रलिया के मूल निवासियों या कहें कि शुरुआत से ही वहां रह रहे लोगों पर राष्ट्रकुल सरकारों द्वारा किए गए अत्याचारों और उनकी नीतियों को लेकर प्रधानमंत्री केविन रड ने संसद में माफी मांगी। व्यावसायिक टेलीवान चैलन अपनी ऊल-जुलूल प्राथमिकताओं की वजह से अक्सर आलोचना का शिकार होते हैं। मगर इस बार ऐसा नहीं था। इस ‘माफी दिवस’ के सीधे प्रसारण के लिए मीडिया ने बड़ी मुस्तैदी दिखाई। जैसे ही प्रधानमंत्री अपने माफीनामे के साथ संसद में दाखिल हुए इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पीछे लग लिया। प्रधानमंत्री का वह वक्तव्य स्तब्ध कर देने वाला तो था ही, खासा भावनात्मक भी रहा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रकुल सरकारों की नीतियों की वजह से ‘पहले ऑस्ट्रेलियाइयों’ को जिस पीड़ा, संताप और हानि से गुजरना पड़ा वे उसके लिए माफी मांगते हैं।ड्ढr इस ‘लाइव प्रसारण’ को देखने के लिए मेलबर्न के फेडरेशन स्क्वायर और यूनिवर्सिटी लेक्चर हॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लगे बड़े-बड़े स्क्रीन्स के आगे सैकड़ों लोगों का हुजूम था। साफ लग रहा था कि एक मुल्क क्षमा-याचना को लेकर क्या-क्या सोच रहा था। कुछ के आंसू निकल पड़े थे। कुछ सिसकियां लेकर टकटकी बांधे उनकी एक-एक बात ध्यान से सुन रहे थे। रड ने बताया कि जिन मूल निवासियों के बच्चों को चुरा लिया गया था वे किस तरह की पीड़ा के दौर से गुजर रहे थे। रड की यह भावनात्मक बयानी देशभर के उन हाारों-हाार लोगों के जेहन में एक अर्से तक बनी रहेगी जो उन विशालकाय पर्दो के सामने खड़े थे। याद करने वाला दृश्य वह भी था जब विपक्ष के नेता ब्रैंडन नेलसन ने इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देने की कोशिश की। तब लोगों ने विरोध स्वरूप अपनी पीठ स्क्रीन्स की तरफ कर ली। हैरत में डालने वाली बात यह है कि इस टेलीकास्ट से एक दिन पहले तक इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में इस पूरे प्रकरण को लेकर किसी तरह की सक्रियता नहीं थी। यह हाल तब था जब सीधे प्रसारण से एक दिन पहले रड का वक्तव्य संसद के पटल पर रखा गया था। बहरहाल, उस ऐतिहासिक दिवस और दृश्य के बाद से देशभर में दो बिंदुओं पर बहस या विमर्श चल रहा है। पहला, क्या यह माफी वाकई जरूरी थी? दूसरे, ऐसी क्या वजहें थीं, जिनके चलते मूल निवासियों के साथ ऐसा बर्ताव किया गया और उनके दुख-दर्द दूर करने के लिए क्या किया जाना जरूरी है? हालांकि इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने दर्शकों को बौद्धिक और राजनैतिक बहस-मुबाहिसों में शामिल तो कर दिया है, पर एक जगह वह चूक गया। आम दर्शक को न तो ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की कोई जानकारी है और न ही उसे यह मालूम कि माफी की राजनीति क्या होती है। ऐसे में यह बात सामने नहीं आ पाई कि आम आदमी इस घटनाक्रम के बारे में क्या सोचता है। हालांकि जिन वायदों के आधार पर लेबर पार्टी ने हालिया चुनाव जीता, उनमें से एक यह भी था कि वह मूल निवासियों से माफी मांगेगी। लेकिन इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि आस्ट्रलियाई लोग तहेदिल से भी इस माफी का समर्थन करेंगे। इस भ्रम को दो चैनलों ने और बढ़ाया। चैनल 7 ने एक ऑन लाइन रायशुमारी में बताया कि उसके 64 प्रतिशत वोटरों का मानना है कि यह माफी जरूरी नहीं थी। उधर, चैनल ने अपनी एक खबर में एक एंग्लो-सैक्सन विधवा और उसके चार बच्चों की कहानी दिखाई। खबर में दिखलाया गया कि मेलबर्न के पास बनदूरा में मूल निवासियों की रिहाइशों से उस विधवा और उसके बच्चों को खदेड़ा जा रहा है क्योंकि उसका पति मर गया था। खैर, मेलबर्न में फेडरेशन स्क्वायर पर लगे बड़े पर्दे पर प्रधानमंत्री का माफीनामा देखने के लिए कोई 8 हजार लोग जमा थे। इस हुजूम का बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री की माफी के फैसले के साथ दिखाई दिया। उधर ऑस्ट्रलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (एबीसी) ने संतुलित रवैया अपनाते हुए कुछ ऐसे लोगों के इंटरव्यू पेश किए, जो मूल निवासियों को हटाने-भगाने के फैसलों का समर्थन करते थे। कई लोगों ने रेडियो, बैनरों या अन्य माध्यमों से माफीनामे का विरोध प्रदर्शित किया। भले ही इंटरनेट काम की चीज है, लेकिन वह ऐतिहासिक लम्हों को कैद करने वाला वह चमत्कार नहीं कर सकता जो टीवी कर सकता है। ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्222.ह्लद्धद्गद्धooह्ल.orद्दद्धह्लह्लश्चज्222.ह्लद्धद्गद्धooह्ल.orद्द से साभारमाया रंगनाथनं

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