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पुलिस को सरकारी अस्पतालों से मिल रहा झटका

आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे और उसके आरोपितों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने की पटना पुलिस की कोशिशों को सरकारी अस्पताल झटका पहुंचा रहे हैं। पुलिस को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना आरोपित के विरुद्ध भादवि की धारा 323, 324, 325 व 326 में आरोप गठन के वक्त करना पड़ता है क्योंकि उस समय तक अस्पतालों से संबंधित मामले की इंजुरी रिपोर्ट थानों को नहीं मिल पाती है। ऐसे मामलों में पुलिस को न्यायालयों में भी कई बार हंसी का पात्र बनना पड़ा है। इस तल्ख सच्चाई को जोनल आईजी राज्यवर्धन शर्मा ने भी किया। उन्होंने पुलिस अधिकारियों और थानों को आवश्यक दिशा निर्देश जारी किए हैं।ड्ढr ड्ढr हत्या का प्रयास, मारपीट या हिंसक झड़प में आयी गंभीर चोट के जख्म प्रतिवेदन के आधार पर ही आरोपित के विरुद्ध लगायी जाने वाली धारा का सत्यापन होता है। पुलिसिया जांच व न्यायालय में सुनवाई के दौरान जख्म प्रतिवेदनों को एक महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में पेश किया जाता है, पर पटना का कोई थाना ऐसा नहीं जहां सरकारी अस्पताल से निर्गत होने वाला जख्म प्रतिवेदन के अभाव में दर्जनों मामले लंबित न हों। पटना शहरी क्षेत्र सहित पूरे जिले में जख्म प्रतिवेदन के अभाव में 16 सौ से अधिक मामले लंबित बताए जाते हैं।ड्ढr ड्ढr गौरतलब है कि साधारण जख्म में भादवि की धारा 323 व 324 का प्रयोग होता है जबकि लाठी, डंडा, पत्थर या भोथरे हथियार से वार पर धारा 325 तथा तीक्ष्णधार हथियार, पिस्तौल, गोली व बम सहित कुछ अन्य घातक हथियारों के प्रयोग पर धारा 325 का प्रयोग किया जाता है। अगर किसी चोट में कान की सुनने की शक्ित खत्म हो जाए, आदमी अंधा हो जाए, दांत टूट जाए या हिल जाए, कोई अंग कट जाए, चेहरा विकृत हो जाए या चोटिल अवस्था में पीड़ित लगातार बीस दिनों तक अस्पताल में रहे तो ऐसे मामलों को गहरा जख्म की श्रेणी में रखते हुए धारा 324 या 325 का प्रयोग करते हुए इसे हत्या का प्रयास (307) से जोड़ दिया जाता है। बाकी चोटों को साधारण चोट की श्रेणी में इंगित किया जाता है।ड्ढr ड्ढr इन चोटों की श्रेणियों का निर्धारण जख्म प्रतिवेदन से ही होता है। अस्पतालों द्वारा समय पर जख्म प्रतिवेदन नहीं निर्गत करने से आरोपितों को सही न्याय भीे थानों से मिलने की गुंजाइश नहीं रहती, जबकि किसी मामले में वास्तविक अपराधी पुलिस की विवशता का लाभ उठा लेते रहे हैं। जख्म प्रतिवेदन लंबित रखने में पीएमसीएच अव्वल नंबर पर है जहां पुलिसकर्मियों के लगातार चक्कर काटते रहने के बावजूद उन्हें प्रतिवेदन हासिल नहीं हो पाता। बताया जाता है कि यहां जख्म प्रतिवेदन के सैकड़ो मामले लंबित हैं। इसके अलावा अन्य सरकारी अस्पतालों की भी यही स्थिति है।

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  • Web Title: पुलिस को सरकारी अस्पतालों से मिल रहा झटका