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सूफी ज्ञानमार्ग

सूफी प्रेम की तरह ज्ञान प्राप्त करने पर भी अधिक जोर देते हैं। उनका कहना है कि बिना ज्ञान प्राप्त किए मनुष्य कुछ भी करने में समर्थ नहीं होता। परमात्मा, सृष्टि, साधना आदि बिना ज्ञान के सम्भव नहीं। एक हदीस (हजरत मुहम्मद के वचन) का हवाला दिया जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए चीन तक जाना चाहिए और सभी स्त्री-पुरुषों के लिए यह जरूरी है। ज्ञान दो प्रकार के कहे गए हैं- इल्म (सांसारिक मानवीय ज्ञान) और मारिफ (आध्यात्मिक सच्चा ज्ञान)। साधारण ज्ञान को इल्म कहते हैं और परमात्मा विषयक सूफियों के रहस्यमय ज्ञान को मारिफ कहते हैं। इल्म की प्राप्ति मनुष्य की चेष्टा को तथा शिक्षक की सहायता से संभव होती है। हुजवीरी का कहना है कि परमात्मा का ज्ञान इल्मे मारिफत है, जिसके द्वारा परमात्मा को उसके पैगम्बर और सन्त जान पाए हैं। जून नून ने बतलाया है कि जो हम आँखों से देखते हैं वह सांसारिक ज्ञान है, लेकिन जो हृदय जान पाता है वह सच्चा ज्ञान है। इल्मे मारिफत मस्तिष्क की क्रियात्मक शक्ित का फल नहीं है बल्कि सम्पूर्ण रूप से यह परमात्मा की इच्छा और अनुग्रह पर निर्भर करता है। परमात्मा मारिफ उसे ही देता है जिसे उसने इसके योग्य बनाया है। परमात्मा के अनुग्रह का यह वह प्रकाश है, जो हृदय को प्रकाशमान कर देता है और मनुष्य की सम्पूर्ण शक्ितयों- शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक- को चकाचौंध करने वाली अपनी किरणों से अभिभूत कर देता है। इस ज्ञान के द्वारा ही साधक परमात्मा के दर्शन कर पाता है। निफारी ने बतलाया है कि परमात्मा के खोजी तीन प्रकार के हैं। पहले तो वे हैं जिन्हें परमात्मा का उपासक कहा जा सकता है। ये लोग स्वर्ग की अभिलाषा से या चमत्कारों की शक्ित की प्राप्ति के लिए उपासना करते हैं। दूसरे वे हैं जो धार्मिक तत्ववेत्ता और शास्त्रीय ज्ञान को प्राप्त करने वाले पंडित हैं। वे परमात्मा के ऐश्वर्य से ही परमात्मा का परिचय प्राप्त करते हैं। वे विभूतियों से युक्त परमात्मा को खोजते हैं लेकिन उसे नहीं पाने के कारण कहते हैं कि वह अज्ञेय है। वे कहते हैं कि हम लोग जानते हैं कि परमात्मा को हम नहीं जान सकते और यही हमारा ज्ञान है। तीसरे आरिफ (ज्ञानी) हैं जो भावाविष्टावस्था में परमात्मा को प्रत्यक्ष करते हैं। मारिफ परमात्मा के एकत्व का बोध है। इसके द्वारा मनुष्य समझ पाता है कि भिन्न की प्रतीति मिथ्या है, एक भूलभुलैया है। यह ज्ञान जब मनुष्य को होता है तभी वह अपने आप को जान पाता है और अपने आपको जानने का मतलब परमात्मा को जानना है। वह अपने आप में सृष्टि का एक छोटा सा संस्करण है और उस सृष्टि की आंख है, जिसमें परमात्मा अपने आप को तथा अपने कायरे को देखता है। यह सृष्टि, असत् से प्रतिबिम्बित होने वाली परमात्मा की गुणावलियों और नामावलियों का समूह है।ं

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