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बिक रहे हैं सपने..खरीदोगे?

राजधानी में सपने बिक रहे हैं। खुलेआम। खरीदोगे.? यकीन कीजिए खरीदारों की लम्बी कतारें लग रही हैं। ऐसी भीड़ जुटती है कि एकबारगी राह चलते लोग ठगे रह जा रहे हैं कि यहां के लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचि में अचानक इतनी अभिवृद्धि कैसे हो गई। लेकिन हॉल के अंदर पहुंचने पर कला-संस्कृतिक की बजाय दूसरी ही दुकान लगी दिखती है। एकदम तिलिस्मी संसार सजा होता है। इस संसार का हिस्सा बनने के लिए दूरदराज के बेरोजगारों को तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। कई लोग तो किराए पर सूट और टाई तक पहनकर पहुंच रहे हैं। रेडियो स्टेशन के आगे महीने में दो दिन टाई भाड़े पर लगाने वाले बाजाप्ता दुकान भी सजा लेते हैं। प्रेक्षागृह में मंच से सपने बेचे जा रहे होते हैं।ड्ढr ड्ढr सूटेड-बूटेड आदमी लच्छेदार भाषण दे रहा होता है-‘बड़ा सपना देखो। खाली पैर या जीप में यहां तक लद कर आए हो तो कोई बात नहीं। हमारे नेटवर्क से जुड़ जाओ। शाम तक एक दर्जन मेम्बर बनाओ। रात को लम्बी चादर तान कर सो जाओ। सुबह उठोगे तो तुम्हारे दरवाजे पर कार खड़ी होगी। बस सपने देखो और सपने खरीदो.’। आदमी इनके शब्दों की लफ्फाजी में इस कदर आ जाता है कि अपना घर-द्वार, जर-जमीन बेचकर इनका मेम्बर बन जाता है। आरंभ में कुछ दिन दो-चार चेक भी मिल जाते हैं लेकिन बाद में सपने चकनाचूर होते हैं और पैर के नीचे से जमीन गायब मिलती है। इन दिनों सपने बेचने का कारोबार राजधानी के दो बड़े प्रेक्षागृहों में चल रहा है। महीने में दो दिन इन हॉलों की बुकिंग होती है।ड्ढr ड्ढr प्रेक्षागृहों में तिल रखने की भी जगह नहीं होती है। सड़क पर गाड़ियों का काफिला लगा होता है। पैदल चलना भी राहगीरों के लिए मुश्किल हो जाता है। नेटवर्किंग के अधिकारी बेरोजगारों को अपने जाल में फंसाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते। हालांकि अधिसंख्य मामलों में सामने नतीजा दुखदायी ही आता है। इसी तरह के नेटवर्किंग से जुड़कर अपनी तमाम संपत्ति व जमा पूंजी गंवा चुके के एन सिंह ने कहा कि ऐसे नेटवर्किंग से जुड़े लोग प्रदेश की बेरोजगारी का फायदा उठाकर बेकार युवकों को लूट रहे हैं और प्रशासन की आंखें बंद हैं। उन्होंने कहा कि बर्बाद होने के बाद उन्हें ये समझ में आया। कभी लाखों में खेलने वाला यह शख्स फिलहाल दुरुखी गली में परचून की एक छोटी दुकान के सहारे जीवन गुजार रहा है। समाजशास्त्री भी सपनों के इस कारोबार को बेरोजगारों के लिए घातक करार देते हैं। उनके मुताबिक सपना नहीं देखना जितना खतरनाक है, उससे अधिक खतरनाक है सपनों का टूटना। इससे आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। सरकार को एक तो बेरोजगार हाथों को काम देना चाहिए दूसरा सपना बेचकर लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने वाली कंपनियों पर सख्ती बरतनी चाहिए। उधर कुछ वरीय कलाकारों ने भी कहा कि सांस्कृतिक परिसर से नेटवर्किंग कारोबार का फलना-फूलना उचित नहीं है।

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