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पाकिस्तान के द्वन्द्व

लोकतंत्र के लिए लंबे आंदोलन और हिंसक दौर से गुजरने के बाद पाकिस्तान में राष्ट्रीय असेम्बली और चार प्रांतीय असेम्बलियों के चुनाव हो गए, लेकिन अभी यह निष्कर्ष निकालना नादानी होगा कि मात्र चुनाव सारी समस्याओं के हल की कुंजी होगा। फिलवक्त, इस तरह के सवाल महत्वपूर्ण हैं कि चुनाव के बाद क्या किसी एक दल या गठबंधन की सरकार बनेगी या राष्ट्रपति मुशर्रफ किस तरह की भावी भूमिका निभाएंगे या कहीं उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर समटने को विवश न होना पड़े? चुनाव सर्वेक्षणों के अनुसार किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिलने की आशा नहीं है। इसकी ता*++++++++++++++++++++++++++++र्*क परिणति दलीय गठबंधन या राष्ट्रीय सरकार ही हो सकती है। संभव है कि अस्थिर हालात में मुशर्रफ अपने लिए संतुलनकारी भूमिका ढूंढ़ें, क्योंकि उनके पास सरकार को भंग करने का विशेषाधिकार है। खंडित जनादेश की सूरत में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के आसिफ जरदारी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नवाज शरीफ दोनों ही मिल-जुलकर सरकार चलाने का संकेत दे चुके हैं, पर यह भरोसा करना मुश्किल है कि ऐन वक्त पर कौन-क्या गुल खिला दे। दोनों के साझा दुश्मन मुशर्रफ हैं और इस नाते उनके हाथ मिलाने की संभावना बनी है, पर आगे चलकर चुनावों के बाद वे अपनी पारम्परिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा-दुश्मनी पर कैसे काबू पाएंगे? दोनों को दो-तिहाई बहुमत मिलने पर यदि वे गठबंधन सरकार बनाते हैं तो मुशर्रफ के लिए यह खतरे की घंटी होगी। ऐसे में सेना के साथ खुफिया संगठन आईएसआई के रुख पर काफी कुछ निर्भर करेगा। पाकिस्तानी घटनाक्रमों को प्रभावित करने की अमेरिकी क्षमता पिछले कुछ समय में घटी है। इसके बावजूद उसने आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान में मुशर्रफ पर दांव लगाकर उन्हें सदैव समर्थन दिया। आम जनता के बीच मुशर्रफ अलोकप्रिय हो चुके हैं क्योंकि उन्हें अमेरिकी मोहरा समझा जाता है। मुद्दे की बात यह है कि पाकिस्तान का विगत उसका पीछा नहीं छोड़ रहा, क्योंकि उसकी राजनीति के ढेर-सारे द्वन्द्व हैं, जो उसके जन्म की शर्तो तथा हुक्मरानों की करतूतों से उपजे हैं। प्रमुख राजनीतिक दलों के स्तर पर विडम्बना ही है कि पीपीपी और पीएमएल (एन) में मूल फर्क सशक्त वैचारिक आधार का न होकर सिर्फ व्यक्ित-आधारित राजनीति और उनकी जातीय पृष्ठभूमि तक सीमित है। राजनीतिक संस्थाओं का इतना क्षरण हो चुका है कि सही मायनों में कारगर लोकतंत्र कायम करने के लिए उसे अभी काफी लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। ऐसे में नेता पाकिस्तान की आम जनता को आतंक व हिंसा पर काबू पाने, बिजली व खाद्य संकट दूर करने या विदेशी कर्ज से मुक्ित दिलाने के सपने दिखा जरूर सकते हैं, पर उन्हें पूरा करना आसान नहीं।ं

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  • Web Title: पाकिस्तान के द्वन्द्व