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गंभीर समस्या पर ओछी राजनीति

उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के आंदोलन में बहुत कुछ बेतुका, असंगत और बेमतलब है। आंकड़े बताते हैं कि 10 से लेकर 2000 तक के दस साल में मुंबई में उत्तर भारतीयों की तादाद काफी बढ़ गई। उनमें पांच साल शिवसेना-भाजपा का शासन था। इतना ही नहीं, मुंबई महापालिका पर भी शिवसेना का ही शासन था और उस शासनकाल में राज ठाकरे का अपना दबदबा था। ऐसे में क्या कोई मान लेगा कि, उत्तर भारतीयों की बढ़ती तादाद की राज को खबर नहीं थी? पहले तो यह साफ हो जाना चाहिए कि अगर कोई समस्या है तो उसमें महाराष्ट्र, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार सब एक साथ शामिल हैं। इसलिए समस्या का हल भी एक साथ तीनों जगह ही निकलेगा। सिर्फ मुंबई में उत्तर भारतीयों को मार भगाने से इसका हल नहीं है। हमें यह भी देखना होगा कि उत्तर प्रदेश (खासकर ईस्टर्न यूपी) और बिहार में जहां से पिछले कुछ साल में सबसे ज्यादा माइग्रेशन हुआ है, लोग किस हालात में रहते हैं? क्यों माइग्रेट करते हैं? साथ में क्या ले जाते हैं और वापस क्या लाते हैं? इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने का समय अब आ गया है। भले ही मुंबई और महाराष्ट्र के ज्यादातर लोग जानते नहीं हों, लेकिन नेता जरूर जानते हैं कि, यूपी के गोरखपुर-कुशीनगर जिले में इंडस्ट्री ठप्प पड़ी हैं। कुशीनगर जिले में कई शुगर फैक्िट्रयां कई साल से बंद हैं। बात हमेशा विदर्भ के किसानों की होती है, ईस्टर्न यूपी और बिहार के किसान किस हालात में जी रहे हैं, उसका मुंबई में जिक्र तक नहीं होता। यूपी-बिहार का भी किसान कर्ज में डूबा है। सरकार की तरफ से उनको अब तक करोड़ों रुपयों का बकाया नहीं मिला है। भदोई जिला कालीन के निर्माण का केन्द्र माना जाता था, लेकिन आज यह उद्योग वहां तेजी से घट रहा है। इलाहाबाद-बनारस-जौनपुर-गोरखपुर-कुशीनगर-महाराजगंज जैसे जिलों में सड़क-बिजली-पानी की समस्या आज भी कायम है। ईस्टर्न यूपी के जिलों में बारिश के मौसम में हर साल बाढ़ की समस्या से लोग त्रस्त होते हैं। बाढ़ के वक्त दो-दो, तीन-तीन महीने तक घुटने तक कीचड़ में लोग रहते हैं। दाल-चावल के लिए कुछ को पांच-दस किमी. का सफर पैदल तय करना पड़ता है। बिहार की कहानी कोई अलग नहीं है। ज्यादातर लोगों को रोजगार उपलब्ध हो ऐसे बड़े उद्योग समूह वहाँ जाने से कतराते हैं। इक्कीसवीं सदी में लोग एक तरफ मेट्रो और बुलेट ट्रेन की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ यूपी-बिहार में रिक्शा चलाने वाले को फटे-पुराने पांच-दस रुपए का नोट पाने के लिए दिनभर पसीना बहाना पड़ रहा है। यूपी-बिहार के कुछ जिलों में सिर्फ गरीबी नहीं, उसके साथ भुखमरी भी है। शिक्षा के लिए सही माहौल नहीं है। पब्लिक हैल्थ सिस्टम आम लोगों तक पहुँच नहीं पाया है। कुछ इलाकों में असामाजिक तत्वों ने इस पर अपना हक जमाया हुआ है। एक घर में खाने वाले पांच-पांच, दस-दस लोग हैं। कमाने वाला एक। कोई कुछ भी कहे। अगर मुंबई में इन जगहों से आए युवकों से बात करें तो उनमें से 0 प्रतिशत लोग सिर्फ और सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए मुंबई आते हैं। आज भी आ रहे हैं। उनके कोई बहुत बड़े सपने नहीं हैं। वैसे भी आम आदमी की ख्वाहिशें क्या होती हैं? पेट के लिए दो वक्त की रोटी, सही शिक्षा, समय पर शादी और रोजगार। लेकिन 60 साल की स्वतंत्रता के बाद हम आम आदमी की इतनी बेसिक जरूरतें पूरी नहीं कर पाए हैं। ऐसे में लाखों की तादाद में लोग अपना कम्फर्ट जोन छोड़ कर इच्छा के विरुद्ध जहां संसाधन ज्यादा हैं, ऐसे महानगरों की तरफ चले आते हैं। झुग्गी-झोंपड़ी, सड़क और गटर के किनारे रहते हैं। साथ में मानसिक-शारीरिक बीमारियां साथ ले जाते हैं। प्रशासन की कार्रवाई के बाद कई बार बसते हैं, बार-बार उजड़ते हैं। जीने की चाह में रिश्वत देना, कानून तोड़ना सीख जाते हैं। उनमें से ज्यादातर अनपढ़-गंवार-पिछड़ी जाति के मजदूर होने की वजह से महानगरों का समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता। इन लोगों का मजदूर वर्ग का होने के बावजूद सर्वाइवल इन्स्टिंक्ट रखना भी मराठियों में नफरत का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। महानगरों में माइग्रेशन के साथ-साथ कई सारी सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएं भी पलती हैं। यह समस्या सिर्फ यूपी-बिहार के लोगों की नहीं, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और कुछ हद तक महाराष्ट्र के विदर्भ-मराठवाड़ा इलाके के लोगों की भी होती है। न इसको कभी गंभीरता से लिया जाता है न इस पर कभी विचार विमर्श होता है। इनमें से कई लोगों का सफर एक नरक से दूसरे नरक का होता है। ऐसे में दोष किसका है? सिर्फ जीवन जीने की चाह में महानगरों की तरफ आ रहे इस आम आदमी का या फिर बड़े-बड़े वादे करने के बावजूद रोजगार की जरूरत भी पूरी कर पाने में असमर्थ रही राजनीति और प्रशासन का? दुर्भाग्य से देश की स्वतंत्रता के बाद आम आदमी का पिछड़ापन ही नेताआें के अस्तित्व का मूल आधार रहा है। चाहे वो सड़क-बिजली पानी जैसी आम जरूरतें हों या फिर शिक्षा और रोजगार। इस पिछड़ेपन को हटाने की बात तो जरूर होती है, लेकिन वास्तविकता में यह पिछड़ापन कायम रहे ऐसा ही प्रयास रहता है। यूपी-बिहार हो या फिर प्रगतिशील महाराष्ट्र इस मामले में चित्र कोई अलग नहीं है। गांव के लोग जब सड़क की मांग करने नेता के पास जाते हैं तो आश्वासन मिलता है, लेकिन वो पूरा नहीं होता। आज भी नेता यही सोचता है कि सड़क बना देंगे तो लोग दूसरे गांव जाने लगेंगे बाहर गांव के लोग आते जाएंगे। बिजनेस बढ़ेगा। मेरा महत्व क्या रहेगा? लोगों की हर समस्या हल हो जाए, तो मेरा वजूद क्या रहेगा? यह बेशक एक सैडिस्ट अप्रोच है। इसी अप्रोच का शिकार हो रही है, यूपी-बिहार की जनता.., जिसकी न कोई आवाज है, न कोई वजूद। यूपी-बिहार के नेता और प्रशासन इस आम आदमी को राज्य के बाहर जाने को मजबूर कर रहे हैं और मुंबई जैसे महानगर के स्थानिक पार्षद-एमएलए कई बार मंत्री तक के नेता अपने पॉलिटिकल फायदे के लिए झुग्गी-झोंपड़ियों में उनके लिए जगह बनाते हैं। मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ आवाज उठाने वाले राज ठाकरे यह जरूर जानते हैं कि, उत्तर भारतीयों का महाराष्ट्र में आना यूपी-बिहार के नेताआें की नाकामी का नतीजा है। मगर उसका हल वो आम आदमी को मार-पीट करवा कर ढूंढ़ना चाहते हैं। क्या उनको सही में उस समस्या का हल ढूंढ़ना है कि सिर्फ अपने वोट बैंक और इमेज को हासिल करना है? लेखक स्वतंत्र मराठी पत्रकार हैं और विस्थापन पर शोध कर रहे हैं

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