DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मोक्ष तुम्हारे भीतर है

संसार में दो कोटि के मनुष्य होते हैं। प्रथम कोटि में वे हैं, जो जीवन का सम्यक लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाते। दूसरी कोटि में वे लोग आते हैं, जो अपने जीवन का सम्यक लक्ष्य निर्धारित करने में सफल होते हैं। इस कोटि के लोग सुसंस्कारी होते हैं। संसार के अधिकांश लोग लक्ष्य निर्धारण के अभाव में प्रथम कोटि में ही रह जाते हैं, किन्तु जीवन की सफलता के लिए मात्र जीवन का सम्यक लक्ष्य निर्धारण ही पर्याप्त नहीं, इसके साथ वहां तक जाने के सही मार्ग का ज्ञान भी आवश्यक है और उस पर सम्यक गति करना भी अपेक्षित है। प्रश्न हुआ, जीवन का सम्यक लक्ष्य क्या होना चाहिए? अध्यात्म में जीवन का लक्ष्य मोक्ष माना गया है। हालांकि उपलक्ष्य अनेक हो सकते हैं पर अंतिम लक्ष्य परमानन्दमय आत्म-स्वरूप प्राप्त करना है। मोक्ष-प्राप्ति की कामना बहुत बड़ी है। इसे कई जन्मों की साधना के बाद समस्त कमरे से मुक्त होने के बाद ही प्राप्त किया जा सकता है। जिसने अहंकार और काम को जीत लिया, जो मन, वचन और शरीर के विकारों से मुक्त हो गया, जो पर पदार्थ की आशाआें से निवृत्त हो गया। उसको यहीं मोक्ष मिल जाता है। आदमी की एक दुर्बलता है- अहंकार। मन के प्रतिकूल काम करने, किसी के द्वारा अपमान पर या किसी की बात स्वीकार न करने पर आदमी का अहंकार उभरता है। यही अहंकार फिर गुस्से को पैदा कर देता है। इसलिए व्यक्ित अपने अहंकार को विगलित करने का प्रयास करे। एक शिष्य ने गुरु से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्ति के बाद शिष्य ने निवेदन किया- गुरुदेव! आपने मुझे ज्ञानदान देकर बहुत कृपा की। मैं इसके प्रतिफल में या कृतज्ञता ज्ञापित करने के रूप में आपको क्या दक्षिणा दे सकता हूं? गुरु ने कहा- वत्स! मुझे कोई कीमती वस्तु नहीं चाहिए। तुम्हें जो बेकार चीज लगे, जिसका कोई उपयोग न हो, वह मुझे दक्षिणा में दे देना। शिष्य गुरुकुल से बाहर निकला और देखा कि यह मिट्टी बेकार की चीज है, इसे ही दे देना चाहिए। वह मिट्टी लेकर गुरु के पास गया। गुरु ने कहा- मिट्टी तो बड़ी काम की चीज है। इससे ईंटें बनती हैं, घड़ा बनता है, बच्चों के खेलने में भी काम आती है। यह तो बहुत उपयोगी है। फिर वह राख लेकर गुरु के पास पहुंचा। गुरु ने राख का भी उपयोग बताते हुए कहा- यह जैन मुनियों के लुंचन में काम आती है। अजीर्ण होने पर राख और नमक की गोली लेने से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है और भी अनेक प्रकार से उपयोगी हो सकती है। शिष्य ने कई वस्तुआें के नाम बताए। किंतु गुरु ने सबकी उपयोगिता सिद्ध कर दी। अंत में शिष्य ने कहा- गुरुदेव! मेरे भीतर जो अहंकार है वह अनुपयोगी है, आप उसे स्वीकार करें। गुरु ने कहा- वत्स! सचमुच, इसका कोई उपयोग नहीं। यह मेरे पास छोड़ दो, तुम हल्के हो जाआेगे। तुम्हारे में ज्ञान का अहंकार कभी नहीं आएगा। जो आदमी अहंकार छोड़ना जानता है, उसको मोक्ष मिल सकता है। ब्रह्मचर्य को सब व्रतों का शिरोमणि है। जीवन की पवित्रता के लिए ब्रह्मचर्य की साधना बहुत जरूरी है। आदमी काम को जीतने की साधना करे। जो काम को जीत लेता है उसको मोक्ष यहीं प्राप्त हो जाता है।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: मोक्ष तुम्हारे भीतर है