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हीरो की हार

अभिनेता संजय दत्त का राजनैतिक करियर कुछेक महीनों का ही है इसलिए उन्हें फिल्मी दृश्यों और सचमुच की राजनैतिक परिस्थितियों का फर्क न मालूम हो तो उसे भुलाया जा सकता है, लेकिन समाजवादी पार्टी में शायद काफी अनुभवी राजनेता हैं, उन्हें तो अपनी पार्टी के नए-नए महासचिव को कुछ सिखाना समझाना चाहिए। भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में कितना ही घालमेल और अराजकता हो, कुछ बुनियादी मर्यादाएं हैं, जिनकी वजह से लोकतंत्र टिका हुआ है। अगर समाजवादी पार्टी कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज का नाम लिए बिना उन पर संजय दत्त को धमकाने का आरोप लगाती है और वह भी बिना किसी प्रमाण के, तो उसे राजनैतिक स्टंटबाजी कह कर खारिा कर सकते हैं, लेकिन लगभग साफ-साफ ढंग से संजय दत्त अगर यह कहते हैं कि भारद्वाज ने सुप्रीम कोर्ट पर उनके खिलाफ फैसला देने के लिए दबाव डाला, तो यह बेहद आपत्तिजनक है। सुप्रीम कोर्ट पर इस तरह बेबुनियाद आरोप लगाना न सिर्फ न्यायपालिका के सम्मान के खिलाफ है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी भावनाओं की भी अवहेलना है। संजय दत्त को अगर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने से रोका है तो उसके पीछे ठोस कारण हैं और वे बेहद स्पष्ट हैं। लेकिन चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित संजय दत्त ने जिस तरह की बयानबाजी की है, वह बतलाती है कि ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ की गांधीगिरी सिर्फ अभिनय थी। संजय दत्त के पिता सुनील दत्त अभिनेता थे और वे सांसद भी रहे। वे अपने सामाजिक कार्य और सौम्य शालीन बर्ताव के लिए भी जाने जाते हैं। उनकी बहन प्रिया दत्त राजनीति में हैं और वे भी कभी विवादास्पद बयानबाजी नहीं करतीं। लेकिन संजय दत्त अपने नए-नए राजनैतिक अनुभवों से इतने बौखला गए हैं या उन्हें ऐसे सलाहकार मिले हैं कि वे अपने परिवार के सुयश की पूंजी को नष्ट कर रहे हैं। अपने परिवार के इस सुयश और परिानों की मदद ने उन्हें तमाम मुसीबतों में सहारा दिया है और इसे खो कर वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। मुन्नाभाई को अपना सर्किट फिर से जांचने की जरूरत है।

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