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हवन मात्र धार्मिक क्रिया नहीं, जीवाणु नाशक भी!

हिन्दू धर्मावलंबियों द्वारा विभिन्न अवसरों पर किए जाने वाली हवन क्रिया मात्र धार्मिक आयोजन अथवा पुण्य अर्जति करने का माध्यम नहीं है। हवन क्रिया के धार्मिक स्वरुप के साथ ही इसका अपना वैज्ञानिक आधार भी है। इस वैज्ञानिक तथ्य की पुष्टि शोधाíथयों द्वारा गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यशाला में की गई है। अग्निहोत्र वैदिक काल से ही प्रयोग में लायी जाने वाली एक विशेष तकनीक है। ईसा से लगभग 7500 वषरे पूर्व ऋग्वेद कालीन समय में हमारे ऋषि-मुनि वातावरण को शु करने के लिए अग्निहोत्र किया करते थे। विश्व के प्राचीनतम गं्रथ ऋग्वेद में जाज्ज्वल्यमान समिधा से नि:सृत लपटों के ऊपर विभिन्न औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों को स्वाहा-स्वाहा बोलकर डालने से वातावरण सुगंधित हो जाता है। हवन सामग्री के उड्डयनशील पदार्थ बाहर वायुमंडल में उपस्थित रोग पैदा करने वाले सूक्ष्म जीवाणुआें को मारते हैं। दस दिवसीय कार्यशाला के संयोजक प्रो. डी. के. माहेश्वरी व प्रो. आर. सी. दुबे ने बताया कि वर्तमान में भारतीय वानस्पतिक शोध संस्थान लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. चंद्रशेखर नौटियाल के एक शोध पत्र से यह बात सामने आई। वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से यह पता लगाया गया कि हवन सामग्री में प्रयुक्त औषधीय पौधों से बहिसृत धुंए का सूक्ष्म जीवियों पर अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि उनके अंदर जीवाणुनाशक गुण पाए जाते हैं। हवन किए जाने वाले कमरों में व्याधिकारक जीवाणुआें जैसे कोरोनी बेक्टीरिया, कटर्ो बेक्टीरिया, इंटेरोबैक्टर, क्लेबसियेला, सिउडोमोनास सिरिंजी, स्टेफिलोकाकस अरियस और जेनथोमानास कंप्रोस्ट्रिस की प्रचुर मात्रा में कमी हो जाती है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के डा. नवनीत एवं शालीनी द्वारा अपने शोध कार्य द्वारा यह बताया गया कि हवन में ऋतुकाल के अनुसार प्रयुक्त सामग्री व समिधाएं ऐसी वनस्पतियां हैं जो विशेष औषधीय गुण रखती हैं। उनमें एल्कालोएड्स, फ्लवनोइड्स, स्टीरिआेड्स, रेसिन्स, फैट्टी ऐसिड आदि तत्व विद्यामान होते हैं, जिनका मुख्य कार्य हानिकारक जीवाणुआें तथा फफूंदी आदि को नष्ट करना है।ं

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