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पंचायतीराज प्रतिनिधियों में जानकारी का अभाव

सूबे में विकास योजनाआें का पंचायत स्तर पर चयन करते समय मुखियागण अपने सहयोगियों तक की सहमति नहीं बनाते हैं। इस कारण स्थिति विकट होती जा रही है। हर तरफ मनमानी का बोलबाला है। इंस्टीटय़ूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आनंद (आईएमआरए) व पंचायतीराज मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संयुक्त रूप से प्रायोजित ‘बिहार में पंचायतीराज की स्थिति’ विषय पर सेमिनार में राज्य भर से आए लोगों ने बताया कि पंचायतराज प्रतिनिधियों में जानकारी का अभाव है।ड्ढr ड्ढr संसर्ग संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाआें के प्रतिनिधियों ने बताया कि राज्य में कहीं पर ग्राम सभाआें का आयोजन नहीं हो रहा है। पंचायत प्रतिनिधियों में जानकारी का अभाव है और इसके लिए विशेष कार्यशाला आयोजित करने की जरूरत है। विकास योजनाएं बिना प्रतिनिधियों के सहयोग के पास की जा रही हैं। सरकारी पदाधिकारियों में भी जानकारी का अभाव है और उन्हें भी काउंसेलिंग की जरूरत है। साथ ही कार्यशाला में सवाल उठाया गया कि जब पंचायत प्रतिनिधियों को लोकसेवकों की श्रेणी में रखा जाता है, तो उन्हें इस आधार पर मानदेय का भुगतान भी किया जाना चाहिए। इस मौके पर स्टेट्स ऑफ पंचायत रिपोर्ट प्रोजेक्ट के समन्वयक प्रो. देवी प्रसाद मिश्रा ने कहा कि पंचायतीराज व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है, जबकि स्थानीय शासन को पूरी तरह से लागू किया जाए। पंचायतीराज संस्थाआें को स्थानीय सरकार का दर्जा दिए बिना पंचायतों को सशक्त रूप दे पाना संभव नहीं होगा। इस मौके पर राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव रघुवंश कुमार सिन्हा ने कहा कि 2001 व 2006 में हुए पंचायत चुनावों में पंचायतीराज व्यवस्था को राज्य में लागू करने का प्रयास किया गया है। बिहार में पहली बार स्थानीय शासन में महिलाआें को बराबर का दर्जा मिला है। कार्यशाला की अध्यक्षता डा. सच्चिदानंद ने की और स्वागत संसर्ग के संस्था के अध्यक्ष विनोद कुमार सिन्हा ने किया। इसमें राज्य के 35 स्वयंसेवी संस्थाआें के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

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