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आर्थिक मंदी की तेज होती चिंताएं

अब इसमें कोई संदेह नहीं बचा। अमेरिका में आर्थिक मंदी शुरू हो गई है। अब बस कुछ ही सवाल बचे हैं - इसके कारण क्या हैं? यह कितनी गहरी होगी? बाकी दुनिया पर इसका क्या असर पड़ेगा? इस मंदी की शुरुआत वित्तीय क्षेत्र में हुई। 2007 में विश्व के बड़े-बड़े बैंकों को भारी घाटा सहना पड़ा। उनमें से कई दिवालिएपन के कगार पर पहुँच गए। इसका मुख्य कारण था उनकी लापरवाह कर्ज नीति और पूँजी-निवेश। उन्होंने अनेक तद्भव (डेरिवेटिन) कर्ज पत्रों में पैसे लगाए, जिसमें आर्थिक जोखिम की काफी ज्यादा आशंका थी। इन बैंकों ने गृह निर्माण के गिरवी बाजार में अटकलबाजी करने वालों को प्रचुर कर्ज दिया। जब इस गिरवी बाजार का बुलबुला फूट गया तो इन्हें भीषण नुकसान उठाना पड़ा। प्रसिद्ध वित्तीय कम्पनी मेरिल लिन्च को 2007 में अरब डॉलर का घाटा सहना पड़ा। इसका प्रमुख कारण था गृह निर्माण के बाजार में इसका 15 अरब डॉलर का कर्ज देना। गिरवी के आधार पर गृह निर्माण में बेहद बढ़त हुई, परंतु घर खरीदने वाला नहीं मिला। इसके चलते आर्थिक मंदी वित्तीय क्षेत्र से निकल कर औद्योगिक क्षेत्र में भी पहुंच गई। वर्तमान संकट का दूसरा कारण है बुश प्रशासन की वित्तीय गैर जिम्मेदारी। प्रशासन ने धनी वगरे को अरबों डॉलर की हर मुमकिन रियायत दी। इसके अलावा सैकड़ों करोड़ डॉलर इराक युद्ध और इसके बाद की स्थिति को सँभालने में खर्च किए गए। नए अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण में भी भारी वृद्धि हुई। फलस्वरूप बजट-घाटा लगातार बढ़ता गया और अमेरिका आन्तरिक संसाधन के संकट के मोड़ पर पहुँच गया। तीसरा कारण है, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में स्वाभाविक तौर पर उतार का आना। चढ़ाव-उतार मुक्त बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य क्रम है। अमेरिका मुक्त-बाजार अर्थव्यवस्था का वृहत्तर और सर्वशक्ितमान नमूना है। पिछले 7-8 साल से अन्य विकसित देशों की तुलना में अमेरिका की आर्थिक वृद्धि दर उच्चतम रही है - औसतन 3.5 से 4 प्रतिशत। इतने वर्ष के चढ़ाव के बाद अमेरिकन अर्थव्यवस्था में उतार का आना अवश्यम्भावी हो गया था। इस प्रकार अमेरिका में वित्तीय संकट, गृह निर्माण उद्योग संकट और स्वाभाविक उतार संकट एक साथ आकर खड़े हो गए हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी आर्थिक संकट अल्पकालीन और कम गहरा होगा, क्योंकि अमेरिकन अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी भी मजबूत है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अमेरिका विश्व का अग्रणी देश है। इसके चलते इसकी श्रम-उत्पादकता सर्वाधिक है। अभी भी बाहर के राष्ट्र अमेरिका में ही पूँजी-निवेश करना चाहते हैं।ड्ढr लेकिन अधिकांश विशेषज्ञों के मतानुसार यह मंदी पिछली मंदियों से अधिक गहरी होगी क्योंकि इस बार कई प्रतिकूल कारण एक साथ सक्रिय हो गए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदी से 2010 के पहले निजात पाना मुश्किल होगा। अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के महानिदेशक ने इस मंदी से उत्पन्न स्थिति को गम्भीर बताया है। और अपनी संस्था के 25 साल से अधिक की पारम्परिक मुद्रास्फीति विरोधी नीति से हटकर, यूरोपीय देशों को घाटे की अर्थव्यवस्था की शरण में जाने की सलाह दी है। 24 जनवरी, 2007 को जारी की गई अपनी ‘विश्व-रोजगार प्रवृत्ति’ रिपोर्ट में अन्तरराष्ट्रीय श्रम-संगठन ने अनुमान लगाया है कि वर्तमान आर्थिक संकट एवं कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि के कारण 2008 में दुनिया में 50 लाख लोग बेरोजगार हो सकते हैं। अमेरिकन आर्थिक संकट की चपेट में कई यूरोपीय देश भी आ चुके हैं। 2007 में ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के बड़े-बड़े बैंकों ने भी भारी घाटा सहा। नतीजा यह हुआ कि इन देशों में भी कर्ज उपलब्धि में कठिनाई हो रही है। और इस सबका परिणाम आर्थिक मंदी के रूप में दिखाई पड़ रहा है। इस साल के पहले महीने में 21-22 जनवरी के शेयर बाजार की भारी गिरावट के बाद भारत सरकार ने आश्वासन दिया कि विकसित देशों की आर्थिक मंदी का असर भारत में बहुत कम होगा। पर यह बात बिलकुल भी सही नहीं है। भारत ने सोच-समझ कर भूमंडलीकरण की नीति अपनाई है और विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के साथ अपनी अर्थव्यवस्था को जोड़ने का प्रयास किया है। इसका एक परिणाम है विश्व व्यापार पर हमारी निर्भरता में वृद्धि। पिछले 10 साल में हमारी राष्ट्रीय आय में निर्यात का योगदान 4-5 प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत हो गया है। हमारे कुल निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत अभी भी अमेरिका और यूरोप को भेजा जाता है। इन देशों की आर्थिक मंदी के चलते हमारे कपड़े, चमड़े की सामग्री, कार के पुर्जे एवं आईटी सॉफ्टवेयर के निर्यात में कमी होगी। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों द्वारा भारत में किए गए आउटसोर्सिंग से उपलब्ध आमदनी में भी कमी होगी। इसके अलावा भारतीय शेयर बाजार में लगाई गई विदेशी पूँजी का भी पलायन होगा। इसका अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर हो सकता है। पर इसमें भी संदेह नहीं कि हमारी अर्थव्यवस्था विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से उतनी जुड़ी हुई नहीं है जितनी चीन या दक्षिण पूर्व एवं पूर्व एशियाई देशों की। मसलन चीन की राष्ट्रीय आय का 40 प्रतिशत और मलेशिया की राष्ट्रीय आय का 70 प्रतिशत निर्यात से प्राप्त होता है। हमारे कुल पूंजी निवेश में विदेशी पूँजी का योगदान अभी भी बहुत कम है। हाल में हमारी राष्ट्रीय बचत एवं पूँजी निवेश के अनुपात में सराहनीय वृद्धि हुई है- 10 के दशक के प्रारंभ के 20-25 प्रतिशत से बढ़कर 30-35 प्रतिशत। हमारे यहाँ मुद्रास्फीति की दर (लगभग 3 प्रतिशत) बाकी के मुकाबले अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित है।ड्ढr चीन भारत की तुलना में विकसित देशों की अर्थव्यवस्था पर कहीं अधिक निर्भर है, इसीलिए इनकी आर्थिक मंदी के चलते यह अधिक असुरक्षित है। परंतु चीन इस संकट से बचने के लिए उचित कदम उठाने के लिए अधिक सक्षम है क्योंकि इसके आन्तरिक संसाधन और विदेशी मुद्रा की निधि हमसे कई गुना ज्यादा है। संकट अथवा सामान्य स्थिति दोनों में भारत का आर्थिक भविष्य उन उपायों पर निर्भर होगा, जिन्हें हमें हर हालत में करना चाहिए परंतु हम कर नहीं पा रहे हैं। ये उपाय हैं- आधारभूत संरचना और सामाजिक विकास- खासकर शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में पर्याप्त पूँजी निवेश, हाशिए में पड़े करोड़ों लोगों को विकास की मुख्य धारा में लाना और थोड़ी बहुत आर्थिक परेशानियों के बावजूद देश में कानून और व्यवस्था बनाए रखना।ड्ढr लेखक भारत के पूर्व विदेश सचिव हैं

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