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जात-पात पूछे नहीं कोय

संत रविदास परम संतोषी व्यक्ित थे। एक बार एक साधु उनके पास आया। उसने इनकी साधु सेवा एवं भगवद्भक्ित से प्रभावित होकर और इनकी अति दरिद्रावस्था देखकर इन्हें पारसमणि दी और कहा, ‘बच्चा, इसे संभालकर रख लो। इससे लोहा छूकर सोना बन जाएगा।’ लेकिन रविदास ने लेने से इंकार कर दिया। साधु ने विचार किया कि शायद रविदास को विश्वास नहीं हुआ, इसलिए उसने रांबी को पारस छुआकर सोना बनाकर दिखा दिया। अंत में साधु यह कहकर कि ‘इसे जब चाहे प्रयोग में ले लेना। पारस को छप्पर में खोंसकर चला गया। कहते हैं कि तेरह मास बाद वही साधु भ्रमण करता हुआ फिर रविदास के पास पहुंचा तो उन्हें उसी प्रकार दरिद्रता का जीवन व्यतीत करते देख पारस के विषय में पूछा। रविदास बोले, ‘महाराज आप जहां रख गए थे, वहीं होगा।’ साधु पारस को छप्पर पर उसी स्थान पाकर रविदास की निस्पृहता एवं अनासक्ित देख हैरान रह गया। संत रविदास के अनुसार किसी भी व्यक्ित की जाति पूछना बेकार है, क्योंकि सभी एक ही पिता की संतान हैं, कोई जाति कुजाति नहीं है। असलियत तो यह है कि जाति-पात का रोग ही मनुष्य को घुन की भांति खाता जा रहा है। रविदास का चिंतन-दर्शन अतीत का नहीं, अपितु वर्तमान और भविष्य का दर्शन है। यह मनुष्य की स्वतंत्रता के पक्षपाती है। स्वाधीनता ही मनुष्य की तथा मानवीय अस्मिता की कसौटी भी है। इतना ही नहीं, रविदास पराधीनता को पाप मानते हैं।ड्ढr रविदास जी कहते हैं कि हे भाई मुझे बताआे कि राम कहां है? सत्य प्रभु श्रीराम के तो नजदीक आता ही नहीं है, जिस राम में सारा संसार भूला है। वह राम यह नहीं है। कर्म, अकर्म, करण में कर्ता किस केशव का नाम है। जिस राम को सम्पूर्ण विश्व जानता है, वह भ्रम है। स्वयं को कोई नहीं जानता है किसे कहा जाए। रविदास काशी में निवास करते थे परंतु उनकी नजर में काबा और काशी में कोई फर्क नहीं था। वे अपनी वाणी में कहते हैं :-ड्ढr रविदास हमारो राम जोई, सोई है रहमान।ड्ढr काबा काशी जाने, यही दोनों एक समान॥ड्ढr रविदास का चिंतन-दर्शन मनुष्य की स्वतंत्रता का पक्षधर है। स्वाधीनता ही मनुष्य की तथा मानवीय अस्मिता की कसौटी भी है। इतना ही नहीं रविदास पराधीनता को पाप मानते हैं :ड्ढr पराधीनता पाप है, जान लेह रे मीत।ड्ढr रविदास पराधीन सों, कौन करे है प्रीत॥ड्ढr पराधीन बनना तो पाप है ही, पराधीन बनाना, बने रहना पाप से भी कहीं निम्न है क्योंकि पराधीन से जो कोई प्यार करता है, वह घृणास्पद माना जाता है। यह रविदास मानते हैं। ‘मन चंगा, तो कसौटी में गंगा।’ड्ढr

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