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प्रदर्शन की वस्तु नहीं प्रेम

शाश्वत प्रेम (अनहद 13 फरवरी) उत्सर्ग की भावना के शिखर को छूता है- राधा का यह कहना- मैं अपने प्रेमी का दर्द नहीं देख सकती भले ही मुझे नर्क में जाना पड़े। कबीर दास ने भी कहा है- ये तो घर प्रेम काखाला का घर नाहिंशीश उतारि भुइ धरेंतब बैठे घर माहिं। प्रेम तो वैयक्ितक भावना है। सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु नहीं है प्रेम।ड्ढr वीरेन्द्र शर्मा, जोधपुर हॉस्टल, पंडारा रोड, नई दिल्लीड्ढr यह कैसा दलित हितड्ढr दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल ने जुलाई 2001 को दिल्ली में अनुसूचित जातिजनजाति राज्य आयोग गठित करने का निर्णय लिया था, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण 7 वषरे बाद भी आयोग गठित नहीं हो पाया, जबकि सरकार इसी दौरान कई अन्य आयोग गठित कर चुकी है। दलितहित के लम्बे दावे करने वाली कांग्रेस का यह कैसा दलित हित है?ड्ढr आे. पी. सोनिक, दिलशाद कालोनी, दिल्लीड्ढr आए भी वो, गए भी वो..ड्ढr राज ठाकरे, ऐसा नाम जिसे मुम्बईवासी लगभग नकार चुके थे उनके शिवसेना से विदा होने के बाद। लेकिन नेता को तो चस्का होता है किसी न किसी बहाने मीडिया में बने रहने का। उनको इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनके किसी कथन से जनता को कितनी राहत या आफत पहुंचती है। जब जनता को बताना था कि राज ठाकरे नाम का एक जीव भी मुंबई में रहता है। सो मुम्बई की जनता को अपने और पराए की आग में झोंक दिया। मामला तूल पकड़ गया। देशभर में समर्थन और विरोध की आग लग गई। उत्तर भारतीयों को पकड़-पकड़ कर मारा पीटा जाने लगा। दूसरा पहलू राज्य सरकार पर दबाव बना कि राज ठाकरे को गिरफ्तार करो। कैसे करें? पहले तो यह बहाना बनता रहा कि पुख्ता प्रमाण जुटाए जा रहे हैं। जैसे पुख्ता प्रमाण जुटाए गए किसी से छिपा नहीं है, ले दे कर राज गिरफ्तार किया गया। एकाध घंटे में जमानत भी हो गई। होनी ही थी क्योंकि मीडिया व अखबारों में जैसी खबरें छपीं उस हिसाब से सरकार जानबूझ कर, पुलिस की मार्फत, ऐसी कमजोरी दर्शाती रही कि राज को जमानत मिल जाए। सारा नाटक देखकर यूं लगा कि आए भी वो गए भी वो, और खत्म फसाना हो गया।ड्ढr इन्द्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प, दिल्लीड्ढr असुरक्षित राष्ट्रीय धरोहरड्ढr हिन्दुस्तान की उन गिनी-चुनी इमारतों में, जिन्हें यूनेस्को ने राष्ट्रीय धरोहर स्मारक घोषित किया, सैकड़ों साल पहले बादशाह अकबर द्वारा निर्मित ‘फतेहपुर सीकरी’ भी एक है। देश-विदेश के हजारों-लाखों पर्यटक इसे देखने आते हैं। सीकरी भ्रमण का मौका मिला। ‘अतिथि देवो भव:’ हमारे देश का और विशेष रूप से पर्यटन विभाग का तो नारा है ही, लेकिन बड़े दुख का विषय है कि बिना टिकट घूमते, गाली बकते, आसपड़ोस के सैकड़ों आवारा लड़कों का इन अतिथियों के प्रति व्यवहार, बड़ा ही अभद्र है। निश्चय ही हिन्दुस्तान से वापस अपने देशों में जाने वाले ये परदेशी, यहां के लोगों की अच्छी छाप नहीं ले जाते होंगे। पुरातत्व विभाग और प्रशासन की लापरवाही का आलम ये है कि लाखों की लागत से बना, मीठे पानी का जल संयंत्र खराब पड़ा है। विदेशी मेहमानों से शौचालय के लिए पैसे वसूले जाते हैं, माहौल असुरक्षित है। अगर पुरातत्व विभाग इस इमारत तथा आसपास के स्मारकों की व्यवस्था दुरुस्त नहीं कर सकते तो ताजमहल की ही तरह सीआईएसएफ के जवानों की तैनाती बड़ी संख्या में होनी चाहिए।ड्ढr असिया, इन्द्रा पार्क, पालम, नई दिल्लीड्ढr क्या कोई और जीव भी?ड्ढr कॉलेजों में डिसेक्शन की प्रक्रिया के लिए महाराष्ट्र सहित देश भर में कॉकरोचों का प्रयोग हो रहा है। पहले मेंढक, फिर चूहा और अब कॉकरोच, विज्ञान के प्रयोगों की बलि चढ़ते जा रहे हैं। कॉकरोज जैसे बेजुबान प्राणी पर यह अत्याचार ही तो है। इस समाज में कॉकरोच गंदगी का सूचक है तो क्या इंसान किसी से कम है? महाराष्ट्र में कालेज की डिसेक्शन प्रक्रिया के लिए एक-एक छात्र को असली 8-8 कॉकरोच चाहिए। यह कहां का इंसाफ है? क्या पूरी कक्षा ही एक कॉकरोच से अपना प्रेक्िटकल पूरा नहीं कर सकती। पर्यावरण में कॉकरोचों का भी योगदान है। बच्चे कॉकरोचों से डरते नहीं बल्कि इनकी माताएं इनको दूध पिलाने के लिए कॉकरोचों से डराती हैं।ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह,सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्लीं

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