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जलवायु परिवर्तन से आवास और भोजन का संकट

जलवायु परिवर्तन के खतरनाक प्रभावों के कारण दुनिया में लाखों लोगों के भोजन, आवास और स्वच्छ पेयजल की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में पर्यावरण और आबादी के विस्थापन विषय पर मंगलवार को यहां आयोजित सम्मेलन में यह चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर समय रहते देश की सरकारों ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के कारगर उपाय नहीं किए तो स्थितियां बेहद विषम हो जाएंगी। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार मामलों की उप उच्चायुक्त कियंग वा वाह कांग ने सम्मेलन में धरती के लगातार बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन का हवाला देते हुए कहा कि इससे समुद्रों के जल स्तर में हो रही बढ़ोत्तरी भीषण तूफान और भयंकर सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाआें के कारण लाखों की संख्या में मानव आबादी को अपनी जगह से विस्थापित होना पड़ेगा। सुश्री कांग ने कहा कि इससे दुनिया के कई हिस्सों खासकर गरीब मुल्कों के लाखों लोग अकाल, भूख और महामारियों की चपेट में होंगे। उन्होंने इस सबंध में दारफुर का जिक्र करते हुए कहा कि भोजन, आवास और पानी जैसी मूलभूत सुविधाआें की कमी के कारण ही यहां के लाखांे लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है। सुश्री कांग ने कहा कि दुनिया के सभी देशों की सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के उपाय करते हुए अपने लोगों को भोजन, पानी और आवास जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं मुहैया कराएं। सान फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय के विधि विभाग में मानवाधिकार कार्यक्रम के निदेशक मिशेल लिगटन ने इस मौके पर कहा कि ग्लोबल वार्मिंग विस्थापन के कगार पर खड़े कई लोगों को आपराधिक गतिविधियों में भी धकेल सकता है। उन्होंने इस संबंध में घाना, सेनेगल और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों का हवाला देते हुए कहा कि इन कृषि प्रधान देशों में आज ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण लाखों एकड़ जमीन पर खेती की पैदावार नष्ट हो चुकी है।

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