DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मैं अकेली हूं, साथ में है सिर्फ मातृभाषा

मां ने मुझे एक भाषा सिखाई थी। वह मां की अपनी भाषा थी। वह भाषा सीखते-सीखते मैं बड़ी हुई। वह भाषा सीखते-सीखते मानुष हुई। मेरे पास भाषा थी, इसीलिए भूख प्यास लगने की बात, अपनी इच्छाओं की बात बोल पाती रही हूं। जब बोलना सीखा, तो मैंने कहा था, ‘मुझे अपना प्राप्य चाहिए।’ मेरे पास भाषा थी, इसीलिए मैं गा सकती थी, दीवारों पर प्रतिवाद लिख सकती थी। सादे कागज पर लिख सकती थी। एक समय ऐसा आया कि मेरा व्यक्ितगत अब कुछ भी व्यक्ितगत नहीं रहा। वह आग बन कर पूरे देश में फैल गया था। तब भाषा ने मुझे दिनोदिन शक्ितशाली बनाया था। सात थप्पड़ खाकर भी एक शब्द न बोलनेवाली लड़की मैं नहीं रही हूं। रेल लाइन के पास झोपड़पट्टियों में घूमनेवाली, शाम को गोल्लाछूट खेलनेवाली लड़की भी नहीं थी। घर की छत पर बैठ कर अकेले रात में आकाश के तारे गिननेवाली लड़की भी मैं नहीं थी। मैं हजारों लोगों की भीड़ के साथ कदम-ताल करनेवाली लड़की थी और तब मैं विभेदों को खत्म करने के लिए व्याकुल हो रही थी। मैं सिर्फ मैं नहीं थी। सिर्फ अपनी नहीं थी। सहस्र् करोड़ों स्त्रियों के प्राप्य की मांग कर रही थी। मेरी बात सुनकर उन्हें इतना क्रोध आया कि उन्होंने मेरा गला पकड़ लिया। धमकी दी कि वे मुझसे मेरी भाषा छीन लेंगे। उन्होंने मेरे हाथ से कलम छीन ली। धमकी दी कि भाषा भी छीन लेंगे। उन्होंने शहरों, नगरों और गांवों में मेरी किताबें जलाने का उत्सव मनाया। मुझे जलाया। जल कर मैं अंगार नहीं हुई, इस्पात बन गई। जिस शक्ित से मुझे मां हासिल हुई थी, उसे कोई नहीं छीन सकता। क्या कोई किसी के भीतर की चेतना को छीन सकता है? भावावेग को छीन सकता है? ये चीजें दोनों हाथों के नाखून और दांत से नहीं काटी जा सकती। क्या वे प्रेम को छीन सकते हैं? नहीं छीन सकते। इसीलिए भाषा को भी नहीं छीन सकते। भाषा तो खून में रहती है। खून से क्या कोई भाषा के कण को अलग कर सकता है? मुझे निर्वासन का दंड मिला। तब मेरे पास कोई नहीं था। कोई स्वजन नहीं, कोई बंधु नहीं। साथ में रही सिर्फ भाषा। दूसरे देश में, भिन्न भाषा-भाषियों की भीड़ में तब मैं और मेरी भाषा एक दूसरे के हृदय में वाक्यों से विनिमय कर प्रवेश करते। यह विनिमय सारी रात जागकर करती हूं। दूसरी भाषाओं की शक्ितशाली मुट्ठी में पीसे जाने के लिए अपनी भाषा को नहीं देती। दूसरी भाषाओं के पांव तले पददलित होने के लिए अपनी भाषा को नहीं देती। अपनी भाषा को कलेजे से लगा कर रखती हूं। उसकी देखभाल करती हूं। उससे बेइंतहा प्यार करती हूं। आंख के आंसुओं से भाषा के शरीर पर लगी धूल को साफ कर देती हूं। भाषा को मां की तरह रखती हूं। बहन की तरह रखती हूं। भाई की तरह रखती हूं। निर्वासन के एक युग में भाषा ही मेरे साथ थी। बर्फ की चादर के नीचे, अंधकार में भाषा ही मेरे साथ थी। भाषा सिर्फ मेरे उच्चारण और श्रवण में नहीं, मेरे हृदय में रही है। भाषा को जाड़े में जब ठंड लगती है, जब वह बर्फ होने लगती है, तो उसे अपने हृदय का ताप देकर बचाती हूं। भाषा मेरी आत्मीय है। बंधु है। वह मेरी मां है। कितने वर्ष कट गए। कितने लोग चले गए। मैं ही पड़ी हुई हूं अकेले। मेरा सब कुछ खो गया है। मैं नि:संग हूं। मेरा कोई संगी नहीं। संगी है सिर्फ मेरी मातृ-भाषा। भाषा है इसीलिए दिवंगत लोगों से मन ही मन बात कर सकती हूं। भाषा है इसीलिए दो चार गद्य-पद्य लिख सकती हूं। कष्ट के दिनों में भाषा के हृदय में मुंह छिपा कर रो सकती हूं। भाषा है इसीलिए कोई है। किन्तु भाषा को लोक का आश्रय चाहिए। देश चाहिए। उष्णता चाहिए। उच्चारण चाहिए। भाषा के लिए मैं सात समुंदर और 13 नदियां पार कर आज यहां हूं अपनी भाषा को बचाने के लिए। भाषा आज सूर्य का मुख देख रही है। वह सूर्यमुखी है। नदी किनारे निचली सीढ़ी में लगी काई को साफ कर भाषा गंगा में और सागर में तैर रही है। मैं जब अपनी भाषा का उच्चारण करती हूं, अपनी मां का उच्चारण करती हूं। मैं जब अपनी भाषा को प्यार करती हूं, अपनी मां को प्यार करती हूं। मां नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वह आसमान में एक तारा हो गई हैं। मां नहीं हैं, पर मां की तरह मेरी देखभाल करती है भाषा। जो भाषा मां से प्यार की बात कहती थी, जो भाषा मां के लिए रोती थी, जिस भाषा में मां अपनी गोद में आने के लिए कहती थी, उस भाषा को मैं जोर से आलिंगन में लेती हूं। मन ही मन कहती हूं कि तुम मां हो। भाषा तुम मुझे साहस देना। शक्ित देना। जैसी शक्ित मां देती थी। मैं प्रतिवादी रचना लिख रही हूं। रास्ते से पत्थर हटा रही हूं, ताकि रास्तों में रास्ते ही रहें। हम स्त्रियों का जो प्राप्त था, उसे खल पुरुषों ने लूट लिया है। आज हम स्त्रियां गूंगी हैं। भाषाहीन हैं। जितनी बार मैं बोलना चाहती हूं, उतनी बार मेरी जबान बंद की जा रही है। मेरे गले में जहर डाला जा रहा है। जितनी बार मैं बोलना चाहती हूं, उतनी ही बार मेरे होंठ सिले जा रहे हैं और जीभ पर कांटा रखा जा रहा है। हम स्त्रियां आखिर कब और कैसे बताएंगी कि हम कुशलपूर्वक नहीं हैं। हजारों वर्षो से पीठ पर नीले निशान लिए, आंख में अनिद्रा लिए, हजारों वर्षो से हम भाषाहीन हैं। नारी के कंठ से इस बार भाषा फूटे। ऐसी चिंगारी फूटे कि आग की तरह वह सब जगह फैल जाए और स्त्रियां जल कर इस्पात हो जाएं, शक्ितशाली हो जाएं। स्त्री आज भाषा का उच्चारण कर रही है। वह प्रतिवाद कर रही है। उसके कंठ पर आज तीक्ष्ण तीव्र भाषा है। स्त्री आज स्त्री के लिए प्यार का उच्चारण कर रही है। मैं और मेरी भाषा मुक्त होकर विचरण करना चाहती हैं। क्या इतनी भी आजादी नहीं मिलेगी? हमारी स्वाधीनता के पांव में जंजीर न डालो। हमारे प्रेम के हृदय पर छुरी न घोंपो।ड्ढr सत्ता तुम दूर रहोड्ढr सत्ता तुम पत्थर न फेंकोड्ढr सत्ता तुम रास्ता न रोकोड्ढr सत्ता तुम प्यार करना सीखोड्ढr सत्ता संभव हो तो तुम मनुष्य बनोड्ढr सत्ता तुम मानवीय बनो।ड्ढr बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका ने यह लेखड्ढr अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस पर लिखा थां

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: मैं अकेली हूं, साथ में है सिर्फ मातृभाषा