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भिखारियों की भी होती है मलाईदार पोस्टिंग

मुंबई और दिल्ली की तर्ज पर समस्तीपुर के भिखारी भी हाईटेक हो गए हैं। सरकारी महकमों की तरह इनमें हाकिम भी हैं और बाबू भी।ड्ढr ड्ढr स्कील के आधार पर ग्रेडिंग और ट्रांसर्फर, तो कामों का बंटा हुआ है बीट। सभी काम नियम से। जिसने कोताही की तो उसे कार्यालय में बैठे प्रधान के आदेश पर जुर्माना तक भरना पड़ सकता है। 70-75 लोगों के इस समाज ने वर्ष 2006 में भिखमंगा समाज संघ का गठन किया था। तभी से नियमों के तहत सारे काम होते हैं। भीख मांगने की कला में निपुण भिखारियों की मलाईदार पोस्टिंग भी होती है। संगठन के अध्यक्ष भिखारी राधे सहनी बताते हैं कि देश में कहीं भी बड़ा मेला लगने वाला हो तो यहां के ट्रेण्ड भिखारियों को वहां भेजा जाता है। पिछले दिनों समाज के 60 सदस्य माघ मेला (इलाहाबाद) क्षेत्र में भिक्षाटन के काम में भेजे गए थे। सावन में यह टोली देवघर चली जाएगी। दशहरा में कुछ लोग जम्मू स्थित वैष्णो देवी के दरबार में तो कुछ कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा तट पर अलग-अलग गुटों में कमाई के लिए भीख मांगेंगे। समस्तीपुर शहर का स्टेशन रोड, मारवाड़ी बाजार, बसंत मार्केट, मूलचन्द रोड और आसपास के क्षेत्रों में सोमवार को भिक्षाटन टीम कामकरती है। शुक्रवार को मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में आय अच्छी होती है। उस दिन भिखारियों का चलान इन्हीं इलाकों के लिए काटा जाता है। वहीं बुधवार और गुरुवार को वीकली ऑफ मनाते हैं। इसके अलावा मंदिर, गिरिजाघर, मस्जिद, पीर स्थान तथा बस स्टैण्ड के पास भिखारियों की दो-चार सदस्यीय टीम बराबर अपने काम में लगी रहती है। संघ के लोगों की मानें तो एक दिन में सामान्यत: प्रति भिखारी की 150-200 रुपए की आय हो जाती है। पर्व व मेले के दिनों में यह आमदनी लगभग चार गुनी बढ़ जाती है। उधर, इस संघ से अलग ट्रेनों की कमान सूरदास भिखारियों के जिम्मे है। करीब दर्जन भर सूरदास आपसी तालमेल के तहत अलग-अलग रूटों एवं ट्रेनों में भिक्षाटन करते हैं। भिखारियों का कार्यक्षेत्र समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर-दरभंगा, समस्तीपुर-बरौनी, समस्तीपुर-सहरसा है। सूरदास सिंघेश्वर दास ने बताया कि बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस लेकर जाने वाला भिखारी वैशाली एक्सप्रेस से लौटेगा जबकि स्वतंत्रता सेनानी में जाने वाला लिच्छवी एक्सप्रेस में आमदनी करते हुए वापस आएगा। श्री दास के अनुसार लौटती ट्रेन में आय ज्यादा होती है। भीख मांगने के लिए बांसुरी वादन, डुगडुगी सूरदासों का खास ‘हथियार’ है।

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