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फिर महिला आरक्षण का शोर

किसी भी दल की महिलाएं अगर दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली का सफल आयोजन करती हैं तो इसमें एक साथ कई संकेत हैं। एक तो यह कि भारतीय राजनीति में औरतों की ताकत अब उस ऊंचाई पर पहुंच चुकी है कि बाकी बची राजनीति को उसके आगे झुकना ही होगा। दूसरे यह कि यह ताकत औरतों के मुद्दों को भारतीय राजनीति के केंद्रीय मुद्दे बना सकती है। बृहस्पतिवार को भारतीय जनता पार्टी की महिला रैली इस लिहाज से खासी महत्वपूर्ण थी। रैली की भीड़ से उत्साहित पार्टी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने लगे हाथ यह घोषणा भी कर दी कि अगर मौजूदा सरकार बजट सत्र में महिला आरक्षण का विधेयक लाती है तो भारतीय जनता पार्टी उसका समर्थन करेगी। रैली में यह बार-बार कहा गया कि महिला आरक्षण का वादा इस सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में है, इसलिए उसे यह वादा पूरा करना चाहिए। पहली नजर में उनकी बात में दम दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि गणित पूरी तरह विधेयक के पक्ष में है। वामपंथी दल तो खैर सबसे पहले से ही पूरी तरह महिला आरक्षण के पक्ष में है। कांग्रेस और भाजपा भी अगर मिल जाएं तो कोई भी इस बिल को रोक नहीं सकता, लेकिन इसमें नई बात क्या है। यह समीकरण तो उस समय भी था, जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ की सरकार थी और आडवाणी उसमें गृहमंत्री थे। इसके बावजूद उनकी अपनी सरकार भी इस बिल को पास नहीं करा सकी थी। दो बार लोकसभा में पेश करने के बावजूद। संसद में बिल को सरकार ही पेश करे, यह जरूरी नहीं होता, भाजपा अगर सचमुच इस मसले पर गंभीर है तो उसे खुद ही बिल संसद में पेश कर देना चाहिए। इससे एक तो उसका पक्ष मजबूत होगा और दूसरे बाकी सभी दलों की नीयत को जगजाहिर करने का मौका मिलेगा। अगर संसद और विधानसभाआें में महिलाआें को आरक्षण देने का मामला सिरे नहीं चढ़ पा रहा है, तो तमाम तरह के निहित स्वार्थ हैं। सब को पता है कि अगर यह विधेयक सचमुच पास हो गया तो सिर्फ लोकसभा के ही 181 पुरुष सांसद अपनी कुर्सी खो बैठंेगे। दरअसल पिछले कुछ साल में राजनैतिक दलों ने महिला आरक्षण को एक ऐसा मुद्दा बना दिया है, जिस पर सिद्धांत रूप में तो सभी सहमत दिखते हैं, लेकिन उसे लागू करने में सभी कन्नी काटते हैं। वे इसकी बात करके महिलाआें का समर्थन और उनके वोट तो चाहते हैं, लेकिन जहां जरूरत है वहां इसके लिए कुछ नहीं करते। महिला आरक्षण का विधेयक कांड अब संसद में लड़ी जाने वाली लड़ाई है, रामलीला मैदान में खेला जाने वाला प्रहसन नहीं। रामलीला मैदान की लड़ाई तो महिलाएं पहले ही जीत चुकी हैं।

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