अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बजट : जिससे तरक्की को ग्रहण न लगे

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने अपने पिछले चार बजट काफी खुशनुमा माहौल में पेश किए थे। तब अर्थव्यवस्था 8.7 फीसदी के सालाना औसत से तरक्की कर रही थी। तेल की कीमतें उबल रही थीं, ब्याज दरें बढ़ी हुई थीं और बाद में तो रुपए की कीमत भी आसमान छूने लगी, लेकिन इसके बावजूद तरक्की अपनी तेजी से जारी थी। अर्थव्यवस्था में निवेश अपनी ऐतिहासिक बुलंदी तक पंहुच गया। अर्थव्यवस्था की इस मजबूती से अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था भी कदमताल कर रही थी। तेज तरक्की ने राजस्व के खजानों को भी खूब भरा, जिससे केंद्र और राज्यों की वित्तीय हालत में भी सुधार हुआ। अब चुनौती विकास दर को बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसके फायदों को लोगों तक पहुंचाने की है। लेकिन इस बार बजट की कहानी उतनी खुशनुमा नहीं होगी, जितनी कि पिछले चार बजट की रही है। ऊंची ब्याज दरों ने तरक्की के बढ़ते कदमों को रोक लिया है। नौ फीसदी की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद 2007-08 में अर्थव्यवस्था की प्रगति 8.7 फीसदी तक आ गई और अगले वित्त वर्ष में इसके और गोता लगाने की आशंका है। औद्योगिक मोर्चे पर सुस्ती दिख रही है, ब्याज दरें ज्यादा होने के कारण कंज्यूमर डय़ूरेबल की बिक्री में गिरावट आई है। रुपए की कीमत बढ़ने का असर कपड़े, चमड़े और दस्तकारी के उन सामानों के निर्यात पर पड़ा है जिनका बाजार कीमत के मामले में काफी संवेदनशील होता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ढीलापन बढ़ रहा है और मंदी की आशंका गहराती जा रही है। अगर मंदी का असर बहुत ज्यादा नहीं हुआ, तो भारत इससे बच जाएगा। लेकिन अगर मंदी ने अपना रंग दिखाया और ज्यादा समय तक चली तो हमारी तरक्की पर ग्रहण लगेगा ही। मुद्रास्फीति का आंकड़ा अभी उस स्तर पर है, जहां रिजर्व बैंक के पैमाने पर राहत देने वाला लगता है, पर महंगाई कई मायनों में राहत नहीं देती। थोक मूल्य सूचकांक अभी चार फीसदी पर ही है, लेकिन खाद्यान्न की कीमतें जिस तरह से बढ़ी हैं उसने गरीब तबके के लिए खासी परेशानी खड़ी की है। फिर खाद्यान्न की तंगी दुनियाभर में ही है और इसलिए हम जो भी अायात करेंगे वह हमें महंगा ही पड़ेगा। इसलिए खाद्यान्न की उत्पादन में किसी भी कमी का मतलब है इनका बाजार में महंगा हो जाना। फिर महंगाई को दबाया भी जा रहा है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को उपभोक्ताआें तक नहीं पहुंचने दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा सरकार का यह आखिरी बजट है। यह चुनाव से बहुत दूर नहीं है, इसलिए सरकार का फोकस आर्थिक सुधार न होकर सत्ता में वापसी के लिए लोकलुभावन नीतियां अपनाने पर होगा। जाहिर है कि आम वर्ष के विपरीत इस साल खर्च ज्यादा ही बढ़ेगा। इन हालात में बजट से क्या उम्मीद बांधी जाए? क्या सरकार देश को एक साथ एक अच्छा अर्थशास्त्र और चुनाव जीतने लायक राजनीति दे सकेगी? इस समय अर्थव्यवस्था की जरूरत तो यह है कि सुधारों को आगे बढ़ाया जाए और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के जरिये तरक्की की रफ्तार को बरकरार रखा जाए। इसी के साथ कृषि में नई जान डालने और महंगाई पर काबू पाने की जरूरत तो खैर है ही, साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके लिए भी कुछ किया जाए, जिन तक तरक्की का लाभ नहीं पंहुचा है। राजनीति का एक चक्र जब पूरा हो रहा है, तो यह उम्मीद रखना बेकार है कि आर्थिक सुधार पर ध्यान दिया जाएगा। पिछले कुछ साल की सबसे मुख्य बात है राज्यों और केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति में सुधार होना। राजस्व घाटे के मोर्चे पर खासी सफलता मिली है, इसलिए जरूरी है कि सरकार ऐसी जगहों पर खर्च बढ़ाए जिससे उत्पादकता में इजाफा हो। मेरे हिसाब से इस समय सबसे बड़ी चिंता का विषय कृषि है। पिछले कई साल से इस क्षेत्र की हालत खस्ता है। इस दौरान दुनियाभर में ही कृषि उत्पादन गिरा है और कीमतें बढ़ी हैं। इसलिए यह देखना जरूरी है कि हमारा घरेलू उत्पादन कम न हो। जरूरत स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों पर ध्यान देने की भी है। इस क्षेत्र में निवेश, विस्तार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए सरकार अगर कुछ करती है, तो इसके नतीजे भी मिलेंगे। दूसरा बड़ा मसला इन्फ्रास्ट्रक्चर का है और अगर इस पर ध्यान न दिया गया तो यह तेज विकास दर का रास्ता रोक देगा। अर्थव्यवस्था 8.7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है, लेकिन हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर की विकास दर छह फीसदी बनी हुई है। अच्छी वित्तीय स्थिति का इस्तेमाल इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने में किया जा सकता है। राजमागरे का निर्माण एक ऐसा काम है, जिसका राजनैतिक फायदा भी मिल सकता है। इसमें लोगों को रोजगार भी मिलता है। हालांकि सरकारों ने कल्याण कार्यक्रमों में खासा खर्च किया है शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। आम धारणा तो यही है कि सरकार इन दोनों मदों में चाहे जितना भी खर्च करे, लेकिन उसका असर नीचे तक नहीं पंहुचता। देश के गरीब लोगों के पास शिक्षा और स्वास्थ्य की सार्वजनिक व्यवस्था के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। इसके लिए वे निजी क्षेत्र की संस्थाआें के पास जाने की हैसियत नहीं रखते। एक और मुद्दा अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी श्रमशक्ित का है। अर्थव्यवस्था तेजी से तरक्की कर रही है, लेकिन एक बड़ी ग्रामीण आबादी के पास रोजगार नहीं है। एक तरफ वह फौज है जिसके पास रोजगार नहीं है, दूसरी तरफ वित्तीय क्षेत्र जैसे कई क्षेत्रों में रोजगार तो है, लेकिन योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे। इससे इन क्षेत्रों में तनख्वाहें बढ़ रही हैं और स्पर्धात्मकता घट रही है। सरकार से ऐसी विसंगति को दूर करने की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए। मुद्रास्फीति फिर बढ़ रही है और रिजर्व बैंक इसे लेकर चिंतित है। विकास दर का घटना और मुद्रास्फीति का बढ़ना खतरनाक भी हो सकता है। इसका एक तरीका यह है कि अप्रत्यक्ष करों को थोड़ा कम किया जाए। इससे मांग बढ़ेगी और भारी ब्याज दरों की वजह से मंदी की तरफ जा रहे ऑटो सैक्टर जैसे उद्योगों को राहत मिलेगी। वित्तमंत्री के पास दो ही विकल्प हैं - एक तो वे लोकलुभावन नीतियों के लिए आ रहे राजनीतिक दबाव के आगे आत्मसमर्पण कर दें और दूसरे कोई ऐसा नया रास्ता निकालें कि अर्थव्यवस्था भी दुरुस्त रहे और राजनीति भी। वित्तमंत्री कौन सा रास्ता अपनाते हैं यह जानने के लिए हमें 2रवरी का इंतजार करना होगा। लेखक क्रिसिल लिमिटेड में निदेशक व प्रिंसिपल इकॉनमिस्ट हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: बजट : जिससे तरक्की को ग्रहण न लगे