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तो फिर क्या मतलब लोकायुक्त की जाँच रिपोर्ट का!

पिछले दस वर्षो से विधानमंडल के दोनों सदनों में राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के लोकायुक्त के वार्षिक प्रतिवेदन नहीं रखे जा रहे हैं। इससे साफ है कि नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार को लेकर पिछली व वर्तमान सरकारें कितनी गंभीर हैं। सदन में वार्षिक रिपोर्ट रखने पर सरकार को जवाब देना पड़ेगा कि जिन नौकरशाहों और विधायकों व मंत्रियों को भ्रष्टाचार के मामलों में लोकायुक्त ने अपनी जाँच में दोषी पाया है, उनके खिलाफ सरकार ने क्या कार्रवाई की है। ऐसे प्रकरणों में राज्यपाल भी बेबस हैं।ड्ढr सूत्रों के अनुसार विधानसभा में लोकायुक्त का वार्षिक प्रतिवेदन वर्ष 1े बाद से नहीं रखा गया। सभी वार्षिक प्रतिवेदन ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। लोकायुक्त संगठन प्रत्येक वर्ष अपने वार्षिक कार्यकलापों से संबंधित प्रतिवेदन छपा कर सतर्कता विभाग के सचिव को विधानमंडल में वितरण के लिए भेज देता है। लेकिन पिछले 10 वर्षो से सतर्कता विभाग द्वारा लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट विधानमंडल के दोनों सदनों में प्रस्तुत नहीं की गई। यह रिपोर्ट तभी सदन में पेश की जाती है जब राज्य सरकार की इच्छा होती है। पिछले दस वर्षो के दौरान भाजपा, सपा और बसपा की सरकारें रहीं, लेकिन किसी ने भी लोकायुक्त संगठन की रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत नहीं होने दिया। गौरतलब है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक अधिनियम के तहत वर्ष 1में लोकायुक्त संगठन का गठन हुआ था। लोकायुक्त नौकरशाहों और विधायक व मंत्रियों के खिलाफ प्राप्त भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करता है।ड्ढr जाँच में जो सरकारी कर्मचारी या अधिकारी दोषी पाया जाता है, उसकी रिपोर्ट मुख्य सचिव को आवश्यक कार्रवाई के वास्ते भेजी जाती है, जबकि विधायक या मंत्रियों के मामलों में कार्रवाई के लिए सीधे मुख्यमंत्री के पास रिपोर्ट भेजी जाती है। साथ ही शासन से अपेक्षा की जाती है कि दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई से लोकायुक्त संगठन को एक माह या तीन माह के भीतर अवगत कराया जाए। यदि शासन द्वारा इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, तब कानूनी प्रावधान के तहत लोकायुक्त राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदन भेजकर उन्हें अवगत कराते हैं।ड्ढr लोकायुक्त पिछले दस वर्षो के दौरान सौ से अधिक विशेष प्रतिवेदन राज्यपाल के पास भेज चुके हैं। इसके बावजूद विधानमंडल में वार्षिक प्रतिवेदन नहीं रखे गए। वार्षिक प्रतिवेदन में लोकायुक्त संगठन के कार्यकलाप का पूरा ब्योरा होता है कि सालभर में कितनी जाँचंे, किसके-किसके खिलाफ की गईं और कितने लोग दोषी पाए गए और कितनों पर शासन ने कार्रवाई की और कितनों पर नहीं की।ं

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