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रखे या हटाए, नियोक्ता जाने : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि उनकी राय में किसी कर्मचारी को सेवा में रखने अथवा सेवानिवृत्त करने जैसे सवालों पर राय देना न्यायालय का काम नहीं है और इसे नियोक्ता के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। उसने यह अहम टिप्पणी जरूरत से ज्यादा कर्मचारियों के कारण घाटे में चल रहे एक सहकारी बैंक के चतुर्थ श्रेणी के अनेक कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के फैसले को सही ठहराते हुए की। न्यायमूर्ति तरुण चटर्जी और न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी की दो सदस्यीय खण्डपीठ ने पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बिहार राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक समिति के सेवानिवृत्त किये गये कर्मचारियों की याचिका को खारिज कर दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि इस सहकारी भूमि विकास बैंक में आवश्यकता से अधिक कर्मचारी ही नहीं थे बल्कि इस वजह से संस्थान घाटे में चल रहा था। ऐसे में प्रतिष्ठान को बचाने के लिये कर्मचारियों की संख्या में कटौती करना जरूरी था। इस बैंक में 166 चपरासियों की आवश्यकता थी लेकिन यहां इस वर्ग में 507 कर्मचारी कार्यरत थे। बैंक के निदेशक मण्डल ने 24 दिसम्बर, 2003 की बैठक में सारे मामले पर विचार के बाद पहले चरण में निचले वर्ग के उन कर्मचारियों को सेवानिवृत्त करने का फैसला किया, जो 30 साल की नौकरी और 50 साल की उम्र पूरी कर चुके थे। इसी आधार पर बैंक के नियमों के तहत इस दायरे में आने वाले चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया गया था। इन कर्मचारियों ने बैंक के इस निर्णय को पहले हाई कोर्ट में और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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  • Web Title: रखे या हटाए, नियोक्ता जाने : सुप्रीम कोर्ट