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हंगामा है क्यों बरपा

भारतीय संस्कृति की पुड़िया बना कर सौ तहों में सहेज कर रखने पर भी कुछ लोगों को उसकी सुरक्षा की चिंता रहती है। यह भावना देश में न जाने कितने रूपों में आकार ले रही है। हमारी संस्कृति का मूल तत्व है सहिष्णुता। सहनशीलता सद्भावना को जन्म देती है। अलग-अलग धमरे, भाषाआें, प्रांतों, देशों और सभ्यताआें में लेन-देन से संस्कृति का विकास होता है। भारतीय संस्कृति का हाजमा बहुत तेज है। हजारों वषरे से इस बात के प्रमाण हमें मिलते रहे हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस तथ्य पर विचार करते हुए कहा था ‘हमारे सामने समाज का जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है। सब जगह मिलावट है। शुद्ध है केवल मनुष्य की जिजीविषा (जीने की इच्छा)। वह गंगा की अबाधित धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है। ..जितना कुछ इस जीवन शक्ित को समर्थ बनाता है, उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता है। ..आज जिसे बहुमूल्य संस्कृति मान रहे हैं, क्या ऐसी ही रहेगी? ..सब बदलेगा विकृत होगा, सब नवीन होगा।’ वैश्वीकरण के इस दौर में देशों के खानपान, वेशभूषा, कलाएं, उत्सव सब का प्रभाव पड़ता है। नई पीढ़ी की तीव्र जिज्ञासा जोखिम के प्रति उत्साह उसे नए-नए प्रयोग करने की आेर प्रेरित करते हैं। यही उसके विकास के लिए आवश्यक भी है। इस रास्ते पर विचलन तो है ही। मां-बाप का निर्देशन उसे सही-गलत का विवेक देकर इन खतरों से बचाता भी रहता है। हाल ही में गुजरा ‘वेलेंटाइन डे’ इसका ताजा उदाहरण है। सारा बाजार नई उम्र के लोगों को आकर्षित करने में लगा रहा। आजकल प्रेम के सभी रिश्तों के दिन तय हो गए हैं। मां, पिता, बहन, प्रेमी आदि के प्रति किसी एक दिन प्यार जताने का रिवाज हो गया है। नैतिकता के रखवालों को यह नागवार गुजरता है। हिंसा, तोड़फोड़, प्रेमी जोड़ों का अपमान बेखौफ होकर करते हैं ये लोग। इसी तरह किसी फिल्म में सामाजिक अन्याय का चित्रण हो या फिर इतिहास में कल्पना का मिश्रण, अचानक इनका आत्मगौरव जाग उठता है। पिक्चर हॉलों पर पथराव आम बात हो गई है। कभी अपने प्रांत में दूसरों की उपस्थिति खलने लगती है तो कभी जाति, धर्म, प्रांतीयता कोई भी आधार लेकर हंगामा हो जाता है। शायद यही उनका मकसद हो गया है। अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता का अधिकार, दूसरे के विश्वास का आदर लोकतंत्र का मूल है, पर ये बेमायने होते जा रहे हैं। अपना मत ही सही है, बाकी सब गलत- यह सोच अहंकार का एक रूप है। राजनीति के मंच पर अपने को साबित करने के लिए मासूमों की बलि देने वाले किसी भी तरह देश के हितैषी नहीं हो सकते। ये लोग अपनी वाणी, कर्म और ऊर्जा को समाज में हो रहे अनाचार को मिटाने में लगाएं, तो बेहतर होगा- बशर्ते अनाचार की उनकी परिभाषा सही हो।ं

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  • Web Title: हंगामा है क्यों बरपा