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एफएम जी, क्या हुआ जवाहर नवीकरण मिशन का

पिछले वित्त वर्ष का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने देश के करोड़ों शहरी गरीबों को बेहतर जीवन देने के मकसद से जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन का ऐलान किया था। योजना के तहत करीब 14 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव रखा गया। इरादा यह था कि इस योजना के माध्यम से शहरों की जलापूर्ति, जल निकासी, सड़कों, फ्लाई ओवरों के निर्माण, सीवेज व्यवस्था वगैरह को चुस्त कर दिया जाए। उसका लाभ गरीबों को भी हो। पर जानकार कहते हैं कि पहला साल तो योजना को लागू करने से पहले उसके लिए आधार तैयार करने पर ही निकल जाता है। विशेषज्ञों की बैठकों के दौर चलते हैं। सेमिनार होते हैं और योजनाओं के लिए टेंडर दिए जाते हैं। उपयरुक्त योजना के साथ भी यही हुआ। इसके परिणाम किस तरह के रहे इस बारे में कोई तस्वीर योजना के शुरू होने के चार-पांच सालों के बाद ही उभर पाती है। दिग्गज अर्थशास्त्रियों की संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) से जुडे डॉ. दिलीप कुमार ने कहा कि हमारे देश के अधिकतर शहरों की हालत बेहद खराब है। नागरिकों को सामान्य नागरिक सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं। मर रहे शहरों में फिर से जान फूंकने के इरादे से उपयरुक्त योजना अपने आप में मील का पत्थ साबित हो सकती है। पर दिक्कत यह है कि हमारे यहां किसी भी योजना को लागू करने के रास्ते में बिचौलिए और संबंधित अधिकारी जमकर पैसा काटते हैं। योजना के लिए तय राशि का 20 फीसदी तक हिस्सा तो घूस की भेंट चढ़ जाता है। डॉ. दिलीप कुमार कहते हैं कि सरकार को इसको या अन्य किसी भी योजना को लागू करते वक्त यह अवश्य सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि पैसा मारने वाले तत्वों के इरादे सफल न हो पाएं। सरकार ने जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन को देश की 27 प्रतिशत शहरों में रहने वाली आबादी के लिए आमतौर पर और उनके स्लमों में रहने वालों के लिए खासतौर पर चालू किया है। दरअसल इसको लेकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी खासी दिलचस्पी दिखाते रहे हैं। यहां तक कहा जाता है कि उनकी व्यक्ितगत पहल पर ही वित्त मंत्रालय ने शहरी विकास मंत्रालय और राज्यों के साथ मिलकर इसका खाका तैयार किया गया। एनसीएईआर के डायरेक्टर जनरल और ख्यात अर्थशास्त्री प्रो. सुमन बेरी तो जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन को लेकर बहुत उम्मीद रखते हैं। वे कहते हैं कि हमने जिस तरह से हमारी दिल्ली में सीलिंग के चलते अप्रिय स्थिति को बनते हुए देखा उसकी रोशनी में लगता है कि सरकार ने शहरों की दशा को बेहतर बनाने की बाबत एक ठोस पहल की है।

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