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नेताओं की बहकती जुबां से पुरबियों में बढ़ रहा खौफ

महाराष्ट्र और बिहार-यूपी के कुछ नेताओं के बहकते जुबां और मचलती हरकतों से खासकर बिहार-यूपी के मजदूर वर्ग के लोगों में खौफ बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि आगामी चुनावों को देखते हुए ही मुंबई और महाराष्ट्र के कुछ शहरों में प्रांतवाद के बहाने माहौल बिगाड़ने की राजनीतिक कोशिश चल रही है। बावजूद इसके यहां यूपी और बिहार के लोगों को सुरक्षा देने और उनमें सुरक्षा की भावना पैदा करने का काम निलू फुले, मोहन धारिया, डाक्टर बाबा आढाव और पीवी सावंत जैसे मराठी लोग भी कर रहे हैं। मगर इस शांति की प्रक्रिया में बाधा डालने का काम नेताओं की ओर से लगातार किया जा रहा है। जबसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे पर कानूनी शिकंजा कसा गया और उनकी रैली और बयानबाजी पर रोक लगी है तबसे यहां शांति का माहौल कायम हो रहा था। मगर राज की मनसे अब बिहार के मराठी राज्यपाल आर. एस. गवई के मामले को अपने ढंग से भुनाने में जुट गई है। मनसे के प्रवक्ता शिशिर शिंदे ने शनिवार को कहा है कि अगर महाराष्ट्र और मराठी लोगों का सम्मान नहीं किया गया तो मुंबई से 25 लाख बिहारियों को वापस भेजना पड़ेगा। इसके अलावा राज गवई के बहाने दलितों को भी अपने आंदोलन में शामिल करने का माहौल तैयार कर रहे हैं। गवई महाराष्ट्र के दलित नेता हैं। उन्हें बिहार विधानसभा में अपमानित करने के मामले को दलित नेता रामदास आठवले ने भी लपक लिया है। उन्होंने गवई की अवमानना पर एतराज जताते हुए बिहार सरकार से अनुरोध किया है कि मराठी भाषियों को सुरक्षा प्रदान करें। उधर शनिवार को बीड में शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने अपनी किसान रैली के दौरान गवई के मामले में एक बार फिर केंद्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद को चेतावनी देते हुए कहा है कि महाराष्ट्र के लोगों को उकसाने की कोशिश न करें। गवई के मामले पर महाराष्ट्र कांग्रेस ने भी नाराजगी जताई है। राज के प्रांतवाद के उगले जहर ने मुंबई और महाराष्ट्र में माहौल तो बिगाड़ा है, लेकिन यहां के यूपी-बिहार के नेताओं ने राज के मकसद को नाकाम करने के लिए प्रतिक्रिया जाहिर करने से खुद को बचाना शुरू कर दिया है। मगर यूपी-बिहार में कुछ नेताओं में खासकर, सपा नेता अमर सिंह और बिहार के लालू प्रसाद के बयानों को यहां रह रहे यूपी और बिहार के लोगों को भी अखरने लगा है।

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