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वेतनमान नहीं तय कर सकता कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि अदालतें कर्मचारियों का वेतनमान तय नहीं कर सकती हैं। सवर्ोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वेतनमान तय करना संबद्ध सरकारों का अधिकार है और इसमें न्यायपालिका दखल नहीं दे सकती है। न्यायमूर्ति ए के माथुर और न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर की खंडपीठ ने पटना उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ बिहार सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने राय सरकार को आदेश दिया था कि वह पशु चिकित्सकों को केन्द्र सरकार के वेतनमान के समकक्ष वेतन दें।ड्ढr ड्ढr उच्चतम न्यायालय ने 22 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि अगर अदालतें किसी विशेष नौकरी के बारे में वेतनमानों की अनुशंसाआें को प्रभावित करना शुरू करती हैं तो इससे सभी संबंधित सेवाआें पर असर पड़ने की संभावना है और इससे सारा संतुलन ही गड़बड़ा जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इससे राज्य की वित्तीय स्थिति भी बिगड़ जाएगी। राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें पशु चिकित्सकों का वेतनमान 6500-10000रुपये से बढ़ाकर 8000-10050 रुपये करने का निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार ने दलील दी कि 6500-10050 रुपये का वेतनमान वेतन समीक्षा समिति द्वारा निर्धारित किया गया था। यही नहीं राज्य के सभी कर्मचारियों के वेतनमान का निर्धारण वेतन समीक्षा समिति द्वारा ही किया गया है और ऐसी स्थिति में उच्च न्यायालय द्वारा किसी एक सेवा समूह को चुनकर उसका वेतनमान बढ़ाये जाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता है।ड्ढr ड्ढr राज्य सरकार की दलील से सहमति जताते हुए सवर्ोच्च न्यायालय ने कहा कि पशु चिकित्सकों के लिए केन्द्रीय वेतनमान देने का हाईकोर्ट का आदेश सही नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि संबंधित सेवा संवर्ग के कर्मचारियों का वेतनमान केन्द्र सरकार या फिर दूसरे राज्य के कर्मचारियों के समतुल्य हो। वेतनमान का निर्धारण राज्य सरकार के संसाधन पर निर्भर करता है।

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