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छटपटाहट चहारदीवारी के बाहर निकलने की

प्रतिस्पर्धा के कई कारण होते हैं। पड़ोसी के पास दो गाड़ियां हैं। उनकी तो बैठक हमेशा दुल्हन की तरह सजी-धजी रहती है। उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में ऊंची फीस देकर अध्ययन कर रहे हैं। इस तरह हम पाते हैं कि हर मानव परेशान है, हैरान है। सोचना होगा, इसका समाधान क्या है।ड्ढr जिन्होंने कभी घर की दहलीज के बाहर पांव नहीं रखा था, वे अब चहारदीवारी की बाहर की चुनौतियों का सामना करने को तैयार हैं। काम की तलाश शुरू हो जाती है। और साथ ही साथ गृहस्थी के अनेक प्रश्न उसे याद आने लगते हैं। बच्चे का क्या होगा? घर का क्या होगा? युग की पुकार है स्वच्छंद नारियों की धारणाएं बदल रही हैं। अब वे सोचती है कि उन्हें भी उन्मुक्त होना है। चहारदीवारी के बाहर निकलना है, अपने चारों आेर बने काल्पनिक घेरों को तोड़ना है। अब नये युग में नया बिहान नये- नये नियम लेकर आ रहा है। नारियां झंडा लेकर तैयार हैं मुक्त होने को। खुदा की करामात तो देखिए, नये घरों और फ्लैटों की दहलीज बनती ही नहीं। विज्ञान जितना ही सुलझा हुआ दिखायी देता है, जीवन के ताने-बाने उतने ही उलझते जा रहे हैं। क्या सही क्या गलत, मनुष्य इस सवाल पर मौन है। सभी, क्या नर क्या नारी दौड़ रहे हैं एक अनिश्चित दिशा में। दिशाहीनता के इस आलम में संभवत: नर नारी का एक-दूसरे के लिए किया गया त्याग ही समस्याआें के इस अंबार को कगार पर लाये। त्याग ही ताकत है, त्याग ही जोड़ता है, त्याग ही मोड़ता है एक-दूसरे की आेर। त्याग से प्रेम की संरचना खुद ब खुद हो जाती है। समाज और परिवार तथा सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए यह एक चिंतन का विषय है।

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