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धर्मसंकट में फंसे हैं राजनीतिक दल

दलीय आधार पर नगर निकाय चुनाव नहीं कराया जाना, दलों के लिए गले की हड्डी बनती जा रही है। जो स्थिति बन रही है, उसमें नामांकन वापसी के बाद दलों से जुड़े कुछ नेताआें को न उगलते बनेगा और न ही निगलते। पूरी पार्टी की प्रतिष्ठा दावं पर लग जायेगी। राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं ने खतरे की घंटी का आभास करने के बाद चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं को समझाना-बुझाना शुरू कर दिया है। बावजूद स्थिति असामान्य है। महापौर पद के लिए अभी बहुत अधिक मारा-मारी नहीं दिख रही है, पर उप महापौर के लिए हर दल में कई नेता ताल ठोक रहे हैं। इनमें कुछ ने नामांकन कर भी दिया है, तो कुछ करने की उम्मीद में हैं। वे अपने-अपने दल से समर्थन की मांग कर रहे हैं, तो दल के नेता उन्हें यह समझाने में जुटे हैं कि अपनी पार्टी से एक ही व्यक्ित चुनाव लड़े, तो बेहतर होगा। वार्डो में तो दलों के नेताओं में घमासान की स्थिति है। एक-एक वार्ड में एक-एक दल से आधा दर्जन तक उम्मीदवार हो जा रहे हैं। उदाहरण के रूप में उप महापौर पद के लिए भाजपा की बात करें, तो इस दल से अब तक चार उम्मीदवारों का नाम सामने आ चुका है। चारों के खड़े हो जाने की स्थिति में भाजपा का वोट बैंक तो बिखरेगा ही, चुनाव परिणाम को भी प्रभावित करेगा। इधर एक अन्य जानकारी के अनुसार मेयर पद के लिए प्रतिपक्ष के नेता अजरुन मुंडा पर उनकी पत्नी मीरा मुंडा को खड़ा करने का दबाव पड़ने लगा है। उप महापौर पद के संभावित उम्मीदवारराजद- अफरोज आलम, हाजी जुबैर भाईड्ढr भाजपा-लक्ष्मीचंद दीक्षित, मनोज मिश्र, योगेश सारस्वत, सतीश सिन्हा, रंजना जायसवालड्ढr कांग्रेस-अरुण पांडेय, विनय सिन्हा दीपू, दीपक लाल,ड्ढr झाविमो-राजीव रंजन प्रसाद, उमरभाई, शिव कुमार सिंहं

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