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सात साल में ढाई कोष

झारखंड राज्य बने सात साल से अधिक हो गये। 2001 से पूर्व 32615 गांवों में से मात्र करीब पांच हजार गांवों में बिजली पहुंची थी। इन सात सालों में पांच हजार गांवों को लेकर कुल 012 गांवों तक बिजली पहुंचायी जा सकी। 1गांव अब भी बिजली विहीन हैं। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत 200तक राज्य के सभी गांवों और 2012 तक सभी घरों तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य है। राज्य बिजली बोर्ड, एनटीपीसी और डीवीसी को इन गांवों तक बिजली पहुंचाने की जिम्मेवारी मिली है। बिजली बोर्ड को आवंटित सभी छह जिलों में विद्युतीकरण का कार्य चल रहे हैं। एनटीपीसी की स्थिति सबसे खराब है। रांची जिले के 1348 और लोहरदगा के 283 गांवों तक बिजली पहुंचाने की जिम्मेवारी भी एनटीपीसी को ही मिली है। रांची जिले में विद्युतीकरण का काम अभी तक शुरू ही नहीं किया गया है। यही स्थिति राज्य की उप राजधानी दुमका सहित संथाल परगना की अन्य जिलों की है।ड्ढr झारखंड के सभी गांवों तक बिजली पहुंचने पर 1166220 केवीए बिजली की जरूरत पड़ेगी। अभी 012 गांवों में 270360 केवीए बिजली मुहैया करायी जा रही है। बिजली उत्पादन बढ़ाने और नया पावर प्लांट लगाने के प्रति सरकार उदासीन है, जबकि झारखंड से कोयला खरीद कर दूसरे राज्य बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। आनेवाले समय में आत्म निर्भर हो जायेंगे।ड्ढr राज्य सरकार की अपनी उत्पादन इकाइयों से 400 से 500 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है, जबकि बिजली की मांग ही 800 मेगावाट से अधिक है। 2012 तक राज्य को 1000 से 1200 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी। इस कमी को पूरा करने के लिए डीवीसी और सेंट्रल पूल से ऊंची दर पर बिजली खरीदी जा रही है। राजधानी सहित पूरे राज्य में बिजली आपूर्ति की स्थिति खराब है। गांवों में बिजली के लिए हाहाकार मचा है। कल 18वीं बार खत्म होगी बिजली बोर्ड की अवधिड्ढr रांची। राज्य बिजली बोर्ड की अवधि 2रवरी को खत्म हो रही है। राज्य सरकार 1वीं बार केंद्र से अवधि विस्तार का अनुरोध करेगी। बोर्ड को चार भागों में बांटने के लिए दो दिन का समय बाकी है, लेकिन सरकार के स्तर पर अब तक इसके लिए किसी तरह का प्रयास करने की जानकारी नहीं है। केंद्र की विद्युत अधिनियम 2003 के प्रभाव में आने के बाद राज्य बिजली बोर्ड को चार भाग मंे बांटना अनिवार्य कर दिया गया है।

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