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रास की उम्मीदवारी पर भाजपा में घमासान

‘एक अनार, सौ बीमार’ की तर्ज पर भाजपा में राज्यसभा की उम्मीदवारी को लेकर जबरदस्त घमासान चल रहा है। बिहार में राज्यसभा की कुल पांच सीटें खाली हो रही हैं। विधायकों की संख्याबल के आधार पर राजग की झोली में तीन सीटें जाएंगी। इनमें जदयू के कुल 88 विधायकों के मद्देनजर इसकी दो और भाजपा के 55 विधायकों के नाते एक सीट पर उसका दावा पक्का है। भाजपा एक और सीट के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर दबाव बना रही है। मगर इसमें वह कहां तक सफल होती है यह भविष्य के गर्भ में है।ड्ढr ड्ढr फिलहाल जो एक सीट पूर्व केन्द्रीय मंत्री और फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा का कार्यकाल पूरा होने से खाली हो रही है, असली जोर-आजमाइश उसी के लिए है। इस एकमात्र सीट पर उम्मीदवारी के लिए बिहार के बड़े भाजपा नेताओं में ‘शह और मात’ का खेल भी चल रहा है। इसके लिए सिन्हा की दावेदारी इस आधार पर खारिज की जा रही है किवे दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। यदि इस बार भी आलाकमान उनको उम्मीदवार बनाता है तो यह उनका तीसरा टर्म होगा। भाजपा में तीन बार राज्यसभा में भेजने की परम्परा नहीं रही है। इसके अपवाद सिर्फ पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी रहे हैं। इसके बावजूद तीसरी बार उनको उम्मीदवार बनाने के लिए पार्टी के कई केन्द्रीय नेता जोर लगा रहे हैं। इसी सीट के लिए पूर्व केन्द्रीय मंत्री डा. सीपी ठाकुर भी मैदान में हैं। डा. ठाकुर पटना लोकसभा क्षेत्र का चुनाव पिछली बार हार गए थे। उधर नए परिसीमन में अब पटना लोकसभा क्षेत्र की स्थिति में काफी उलट-पलट हो गया है। लिहाजा डा. ठाकुर के लिए यह सीट जातीय समीकरण के मद्देनजर अनुकूल नहीं रही है। यही वजह है कि वह भी राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचने के लिए इच्छुक हैं।ड्ढr ड्ढr लेकिन आलाकमान के सामने मुश्किल यह है कि शत्रुघ्न सिन्हा का टिकट काटकर यदि डा. ठाकुर को उम्मीदवार बनाया गया तो कायस्थ मतदाता नाराज न हो जाएं। इसकी बानगी केन्द्रीय नेतृत्व उस वक्त देख चुका है जब ठाकुर की जगह शत्रुघ्न सिन्हा को केन्द्र की पिछली राजग सरकार में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था। पार्टी के इस फैसले के खिलाफ डा. ठाकुर के ब्रह्मर्षि समाज के समर्थकों में खासी नाराजगी थी। उधर राजपूत जाति में प्रमुख रूप से दो नाम-पूर्व अध्यक्ष गोपाल नारायण सिंह और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी चर्चा में हैं। सिंह भाजपा नेतृत्व द्वारा दो बार विधान पार्षद की उम्मीदवारी की पेशकश ठुकरा चुके हैं। उनकी प्रमुख उपलब्धियों के खाते में अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में वर्षो बाद पटना के गांधी मैदान में रैली कराना है। वहीं छपरा से लोकसभा चुनाव हारने के बाद रूड़ी भी इस सीट पर नजर टिकाए हुए हैं। इन सबके साथ ही ब्राह्मण जाति से असम सहित पूर्वोत्तर राज्यों के भाजपा प्रभारी हरेन्द्र प्रताप का नाम भी चर्चा में है। भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री रहे प्रताप की दावीदारी पूरी तरह संघ के भरोसे टिकी है। इनके लिए तर्क यह दिया जा रहा है कि पूर्वोत्तर राज्यों का प्रभारी होने के नाते इन पर संगठन का काफी खर्च है। इसे कम करने के लिए इनको राज्यसभा में भेजा जा सकता है। इसी तरह पिछड़ी जाति से डा. एसएन आर्या का नाम उछाला जा रहा है। डा. आर्या पार्टी के पुराने सिपाही रहे हैं और हाल ही में इनको चिकित्सा क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यो के लिए ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया है। कुल मिलाकर भाजपा आलाकमान के सामने भी इस एक सीट के लिए कम धर्मसंकट नहीं है।ं

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