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रांची में मेयर का पद आरक्षित करना गलत: देवी प्रसाद

निगम चुनावों को लेकर प्रत्याशियों के अजीबोगरीब उत्साह से खिन्न बुद्धिजीवी तबका तटस्थ तो है लेकिन उनकी तिरछी नजर बदस्तूर पैनी बनी हुई है। जाने-माने कानूनविद् देवी प्रसाद के लुब्बेलुबाब अंदाज सुनिये- यह चुनाव ही पूरी तरह गलत है! वह कहते हैं कि रांची के मेयर पद को रिजर्व करना बेतुका है। उसपर से यह प्ली!. कि धनबाद में रिजर्वेशन हटा दिया गया है, यह भी बेमानी है। आखिर, रांची का टैक्सपेयर अलग है, धनबाद का अलग। और, रांची का नागरिक धनबाद में जाकर तो एलेक्शन नहीं लड़ सकता। देवी बाबू विभिन्न वाडरे के सीटों को रिजर्व किये जाने से भी नाखुश हैं। कहीं आदिवासी के लिये रिजर्व है तो कहीं महिला के लिये। इससे तो समाज में बेवजह वैमनस्य फैलेगा। वह बताते हैं कि जब नगरपालिका थी तो कभी इस तरह का रिजर्वेशन था ही नहीं। देवी बाबू ने साठ के दशक वाला चुनाव लड़ा था, जीते भी। वह याद करते हैं कि उनकी घड़ा पार्टी उस वक्त 15 सदस्यों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। उनका चेयरमैन बनना तय था। लेकिन, डिस्टिलियरी वाले शिव नारायण जायसवाल चार नोमिटेड सदस्य ले आये जिससे उन्हें बहुमत मिल गया। जायसवाल को कांग्रेस का समर्थन था। अपनी उस हार की बजाय उस वक्त के योग्य प्रत्याशियों और सदभावपूर्ण वातावरण को देवी बाबू ज्यादा याद करते हैं। वर्तमान में गिरते माहौल पर चिंता करते वह बताते हैं हमलोगों के समय चुनाव पर खर्चा नहीं था, लेकिन आज के खर्च और आदिवाीस-गैरआदिवासी के बीच वैमनस्य की आशंका को देखते हुए शायद ही कोई अच्छा आदमी सामने आये। देवी बाबू पिछले 60 साल से रांची में वकालत कर रहे हैं। उनका परिवार 1से रांची में है। वह मूलत: लोहरदगा के निवासी हैं। उनके परदादा बैजनाथ प्रसाद वहां आये थे। दादा थे महेश दत्त। देवी बाबू के बड़े भाई, नामी वकील शंभु प्रसाद भी रांची नगरपालिका में म्युनिसिपल कमिश्नर रह चुके थे। उनकी ही देखरेख में देवी बाबू की पढाई लिखाई हुई। रांची में इंटरमीडियट तक पढ़ा, फिर पटना से ग्रैजुएशन करके कानून की डिग्री हासिल की।ं

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