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कलम पकड़ने की उम्र में बना रहे जूते

दिन भर काम करे के बाद बीस, पच्चीस रुपया होबइई, तबे घर में खाना-खाना बनहई, न कमाम तो भूखे रहे पड़ी.। यह कहना है उन मासूम बच्चों का जिन्होंने होश सम्भालते ही घर संभालना शुरू कर दिया है। जानीपुर थाने से चंद दूरी पर सड़क के किनारे बोरे बिछाकर लोगों के जूता-चप्पल मरम्मत कर रहे दीपक व आजाद दो भाइयों की कहानी अजीब है। आजाद पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना चाहता है, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दोनों भाइयों ने विद्यालय का कभी मुंह नहीं देखा।ड्ढr ड्ढr पिता मोची का काम करते हैं और ये दोनों भाई पिता की मदद करते हैं। आजाद और दीपक को इसके लिए किसी से कोई शिकायत नहीं। अब ये दोनों भाई धीरे-धीरे इतने अभ्यस्त हो गये है कि इस काम में इन्हें जरा भी संकोच नहीं होता। दोनों भाइयों ने यह ठान रखा है कि कड़ी मेहनत कर अपनी दोनों बहनों के लिए बढ़िया वर ढुंढ़ेंगे। बातचीत के क्रम में आजाद ने बताया कि वह जानीपुर में एक झोपड़ी में किसी तरह परिवार के साथ जीवन बसर कर रहा है। सरकारी योजनाओं एवं आर्थिक मदद से महफूज ये नन्हे दिनभर कड़ी मेहनत कर बामुश्किल परिवार के लिए दो जून की रोटी जूटा लेते हैं। दीपक के पिता राजदेव रविदास ने बताया कि बाबू खाय ला पैसा न हई त एखनी के पढ़ाइब कहां से।ड्ढr बहरहाल जहां एक तरफ 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य है। सरकार द्वारा भी गरीब बच्चों को शिक्षित बनाने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। मध्याह्न् भोजन से लेकर वस्त्र, साइकिल आदि योजनाएं लागू की गई हैं। ऐसे में दीपक व आजाद जैसे बच्चे सरकारी व्यवस्था को खुलेआम मुंह चिढ़ा रहे हैं। यह तो एक उदाहरण मात्र है। ऐसे कितने बच्चे हैं जो अपने एवं परिवार के लोगों का पेट पालने के लिए पढ़ने की उम्र में कलम की जगह औजार उठाने को मजबूर हैं। ऐसे में बचपन बचाओ आंदोलन यहां-टांय-टांय फिस्स होता नजर आ रहा है।

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