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राज दरबार- दांत

साहब एमपी रहे हैं। मंत्री रहे हैं। अभी सिर्फ विधायक हैं। विधानसभा में महामहिम का अभिभाषण चल रहा था कि उन्हें याद दिला दी कि उनके राज्य में बिहारियों के साथ अच्छा नहीं हो रहा है। मीडिया ने उसे बढ़ा-चढ़ा कर परोस दिया। उधर महामहिम के राज्य में भी प्रतिक्रिया हुई। सेनावालों ने कहा कि बिहारी विधायक को सबक सिखाएंगे। यह खबर अंग्रेजी के एक अखबार में छपी। लोक लुभावन बजट पेश करने के बाद सुप्रीमो पटना आए थे। शाम की बैठक में उनके सामने विधायकजी ने अंग्रेजी का अखबार रखा। सुप्रीमो ने खबर पर गौर किया। बोले-कुछ खास बात नहीं है। दांत तोड़ने की धमकी दी है। रखिए। साहब के बगल में बैठे सज्जन ने पूछा-दांत असली हैं क्या? साहब चुप। सहानुभूति मिली-हमला करे तो दांत खोलकर दे दीजिएगा।ड्ढr ड्ढr भले लोगड्ढr पुरानी पार्टी की लाख आलोचना कीजिए। मगर मानकर चलिए कि उसमें समाज मंे मौजूद सभी तरह के लोग आज भी हैं। पिछले महीने देश की प्रथम महिला बिहार आईं थीं। उनके प्रस्थान के बाद पुरानी पार्टी के एक नेता को प्रोटोकॉल की याद आ गई-सीएम प्रथम महिला के साथ हर जगह क्यों नहीं गए। यह अच्छी बात नहीं है। उसके कुछ दिन बाद ही मारीशस के प्रधानमंत्री बिहार आए। लोगों ने देखा कि केंद्र सरकार के मंत्री उनके साथ नहीं हैं। किसी ने नोटिस नहीं ली। यह सवाल भी उच्च सदन के गांधी टोपीधारी सज्जन के दिमाग में आया कि केंद्र सरकार ने मारीशस के पीएम के बिहार आगमन के समय प्रोटाकॉल का पालन क्यों नहीं किया। मानिए कि पुरानी पार्टी बगिया की तरह है। उसमें हर तरह के फूल हैं। खुशबू वाले हैं तो बदबूदार भी।ड्ढr ड्ढr शुभचिंतकड्ढr भला सोचनेवाले लोग शुभचिंतक होते हैं। इस समय राज्यसभा और विधानसभा की मेंबरी हासिल करने का शुभ लगन है। कतार में शामिल लोग हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। बाबा लोग भी बड़ी तादाद में कतार में खड़े हैं। आदमी फेल कर जाए तो भगवान काम आएंगे। इसी सोच से जदयू के एक बाबा रजरप्पा की यात्रा कर आए। दूसरे बाबा का खुफिया भी वहां मौजूद था। उसने वायरवाले फोन से सूचना दी-ये रजरप्पा में पूजा करके जा चुके हैं। अब आप भी आ जाइए। दूसरेवाले बाबा बस पकड़ कर रजरप्पा की यात्रा पर निकल चुके हैं। आगे भगवान की मर्जी।ड्ढr ड्ढr जवानड्ढr दरबार में बधाई देनेवालों का तांता लगा था। एक बुजुर्ग ने न भूतो न भविष्यति कहकर सबकी बोलती बंद कर दी। पहले से बधाई दे चुके दरबारियों के चेहरे पर लानत का भाव पसर गया-यह आइडिया मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया। उसके बाद कसर निकालने की बारी आई। बुजुर्ग को लक्ष्य कर दांव चला गया-एक उम्र के बाद राजनीति से रिटायर होने में ही भलाई है। यह उल्टा पड़ा। सुप्रीमो को दरबारी की नासमझी पर तरस आई। वे बोले-पालीटिक्स में ऐसा नहीं होता है। डेथ बेड पर पड़े पालिटिशियन के कान में भी चुनाव और टिकट की बात आती है तो वह उठ खड़ा होता है। ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है। अपनी बात पर जोर डालने के लिए उन्होंने एक पूर्व पीएम के साथ कई नेताआें का नाम लिया। बुजुर्ग के चेहरे पर विजय का भाव आ गया था।ड्ढr ड्ढr अनुशासनड्ढr अधिक बोलने से फंसने का अंदेशा रहता है। बम और गोला चलाए बगैर जंग जीतनेवाले पुराने समाजवादी एक दिन खुद के जाल मंे फंस गए थे। दरबार में राजा थे। उच्च सदन के सर्वेसर्वा थे और समाजवादी नेताजी भी थे। बात पढ़ाई-लिखाई की चल पड़ी। कुछ राजा बोले। उच्च सदन के सर्वेसर्वा क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र से आते हैं। सो, उन्होंने जिन्दगी के हर मोड़ पर अनुशासन की महत्ता की चर्चा कर दी। समाजवादी सज्जन कहां चुप रहनेवाले थे। वे बोल पड़े-मैंने मैट्रिक की परीक्षा सीधे दे दी। कभी क्लास नहीं किया। पढ़ने में तेज थे सो अव्वल दर्जा भी मिला। उच्च सदन के सर्वेसर्वा की टिप्पणी थी-आेह, आज पता चला कि आप इतने अधिक अनुशासनहीन क्यों हैं?

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