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वोटर के लिए शुक्रवार को पेश आम बजट किसी चांद से कम नही होगां, लेकिन देखनेवालों को इस चांद में कई दाग दिखे हैं। शनिवार को मीडिया में प्रसारित इंटरव्यू कार्यक्रमों और दूसरे मंचों पर वित्तमंत्री से लगातार ये सवाल पूछे जाते रहे। असंतुष्ट खेमे का सबसे बड़ा सवाल हैं किसानों की कर्ज माफी के लिए घोषित 60 हजार करोड़ रुपये आखिर कहां से आएंगे। बजट दस्तावेज में इस बात का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। दूसरा सवाल यह पूछा जा रहा है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन आयोग पर होने वाले खर्च का प्रावधान क्यों नहीं किया गया। जब यह तय है कि छठा आयोग इसी साल अवार्ड का ऐलान करेगा तो उसके प्रोविजन को पहेली बनाकर क्यों रखा गया? जिस तरह एनडीए सरकार ने 4006 में चुनाव से पहले एक मिनी बजट परोसा था, क्या यूपीए सरकार भी पे कमिशन के अवार्ड की आड़ में कोई मिनी बजट पेश करने की तैयारी कर रही है? एक्सपर्ट बिरादरी का सवाल यह है कि कर्ज माफी से उन किसानों के तो आंसू पुंछ जाएंगे जिन्होंने बैंकों से कर्जे लिए हुए हैं लेकिन उन बहुसंख्यक किसानों का क्या होगा जो महाजनों से कर्ज लेते हैं या जिनकी बैंकों तक पहुंच ही नहीं है? दूसरा सवाल यह है कि क्या अब वे किसान ठगे महसूस नहीं करेंगे जिन्होंने ईमानदारी से वक्त पर अपने कर्जे चुका दिए थे? क्या इससे देश में एक अनुशासनहीन क्रेडिट कल्चर नहीं मजबूत होगी? तीसरा सवाल यह है कि बजट में पेट्रोबांड के जरिए आज की देनदारी को आने वाली पीढ़ियों पर ट्रांसफर कैसे कर दिया गया है? क्या पेट्रोबांड की अदायगी छिपाने से एफआरबीएम कानून का मखौल नहीं उड़ा? राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखें तो माकपा का प्रश्न है कि कर्जमाफी के लिए दो हेक्टेयर की सीमा तय करते वक्त सिंचित भूमि और सूखी भूमि में अंतर क्यों नहीं किया गया क्योंकि तीन हेक्टेयर असिंचित जमीन के मालिकों की हालत दो एकड़ सिंचित भूमि के मालिकों से ज्यादा दीन हो सकती है। उधर, बीजेपी का आरोप है कि सरकार ने लोकलुभावन बजट की आड़ में भविष्य की सरकारों पर बोझ लाद दिया है।ड्ढr यह संजीवनी उबार पाएगी किसानों को : पेज -15ड्ढr वित्तमंत्री की हिन्दुस्तान से बाचतीत देखें बिजनेस पेज

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