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अपराधियों ने भभुआ जेल में फोड़ा बम

ैमूर के कुख्यात निर्मल यादव व उसके गिरोह के सदस्यों ने रविवार को जेल परिसर में बम विस्फोट कर दहशत पैदा कर दिया। बम विस्फोट होने के बाद जेलकर्मियों व आसपास के दुकानदारों व राहगीरों के बीच अफरा-तफरी मच गई और वहां काला धुआं फैल गया। जब यह घटना घटी सुरक्षाकर्मी जेल की सुरक्षा में तैनात थे। लेकिन, अपराधी भाग निकले। जेल परिसर से सटे एसपी आवास और थोड़ी दूरी पर ही सदर थाना है। हालांकि इस घटना में किसी तरह की क्षति नहीं पहुंची है।ड्ढr ड्ढr पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार दलबल के साथ घटना स्थल पर पहुंचकर मामले की जांच की तथा तैनात सुरक्षाकर्मियों को सतर्क रहने का निर्देश दिया। मौके पर कारा अधीक्षक उमेश प्रसाद सिंह व कारापाल मनोज कुमार सिन्हा भी मौजूद थे। घटना स्थल की डीएसपी संजय कुमार, इस्पेक्टर विश्वनाथ सिंह, थानाध्यक्ष रमेश सिंह ने भी जांच की। एसपी ने बताया कि निर्मल यादव व उसके साथियों के शहर में आने की सूचना पर पुलिस द्वारा सघन वाहन चेकिंग लगाई गई थी। उन्होंने बताया कि पुलिस उसका सीवों मेला के पास से पीछा की। रास्ते में सड़क पर से ही साधारण बम को जेल परिसर में लुढ़का दिया, जिससे बम फट गया। सूत्रों ने बताया कि निर्मल यादव के साथ तीन अन्य अपराधी दो मोटरसाइकिल पर सवार होकर आए थे, जो बम फेंककर पूरब दिशा की आेर भाग निकले। पुलिस ने घटना स्थल से बम के अवशेष को बरामद किया है। इस घटना के बाद से जेलकर्मियों में दहशत है। बम फेंकने के पीछे अपराधियों की क्या मंशा थी स्पष्ट नहीं हो सकी है।ड्ढr ड्ढr मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव से किया जवाब तलबड्ढr छपरा (छ.सं.)। भगवान बाजार पुलिस द्वारा दस वर्ष पूर्व मनमाने ढंग से एक व्यक्ित को थाने में रखकर प्रताड़ित करने पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे गंभीरता से लेते हुए बिहार के मुख्य सचिव से 10 मार्च या उसके पहले जवाब मांगा है। पत्र के अनुसार पूछा गया है कि अनावश्यक ढंग से थाने में रखने के कारण पीड़ित को क्यों न मुआवजे का भुगतान किया जाय। आयोग के संयुक्त रजिस्ट्रार द्वारा प्रेषित पत्र के बाद राज्य सरकार ने डीएम तथा एसपी से इस पूरे मामले में जवाब मांगा है। अपहरण के एक मामले में तत्कालीन अनुसंधानकर्ता जे.सी.राम द्वारा अरविंद कु.पांडेय को 21 अक्तूबर से 24 अक्तूबर 2000 तक थाने में गलत ढंग से रखा गया। पीड़ित श्री पांडेय ने 23 फरवरी 2001 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ शिकायत की। आयोग की टीम ने जांच के बाद शिकायत को सही पाया। फिर बिहार के डीजीपी को दोषी पदाधिकारी पर विभागीय कार्रवाई का निर्देश 14 मार्च 02 को दिया । परन्तु पांच वर्ष तक सरकार ने इस पर अमल नहीं किया। इस बीच 18 मई 07 को पटना में आयोग के कैम्प के दौरान इस मामले पर डीजीपी द्वारा दोषी पदाधिकारी पर दोष प्रमाणित होने की वजह से दो एडवर्स मार्क देने की जानकारी दी गई।

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